संतकवि दरिया साहब के काव्य में गुरुतत्व की अवधारणा
- डाॅ०राकेश सक्सेना , एटा
मध्यकालीन भारत के महान निर्गुण सूफी संतकवि दरिया साहब का जन्म दलदास दरियापंथी के अनुसार 1634 ई० में अश्विन माह के रविवार को बिहार के रोहतास जिले के धारकंधा में नाना के घर हुआ था। वे उज्जैन के मुस्लिम पूरनशाह के पुत्र थे।नौ वर्ष की अल्पायु में आपका विवाह शाहमती के साथ हो गया था और बीस वर्ष की अवस्था में विरक्त होकर आपने संत जीवन व्यतीत करना आरम्भ किया तदन्तर तीस वर्ष की आयु में अपना दरिया सम्प्रदाय स्थापित किया। यह सम्प्रदाय एकेश्वरवाद ( एक ही निराकार परमेश्वर ) में विश्वास करता है। इसमें बाहरी पूजा-पाठ, तीर्थ, व्रत और जातिभेद का कोई स्थान नहीं है। इसमें आन्तरिक साधना, शब्दनाम और सदगुरु की महिमा पर अत्यधिक जोर दिया जाता है। आप स्वयं को कबीर का अवतार मानते थे और यथासंभव उनके पदचिह्नों पर चलने का भी प्रयत्न किया था। प्रारम्भ में गाँव के गणेश पण्डित एवं उनके साथियों के उग्र विरोध का सामना भी करना पड़ा था किन्तु शनै: - शनै: आपकी प्रसिद्धि बढ़ती गई और हिन्दू-मुसलमान दोनों ही आपके अनुयायी बनकर पंथ में समान रूप से आदर- सम्मान पाने लगे। आप निर्गुण संत परम्परा के प्रमुख कवि थे। ज्ञान दीपक, दरिया सागर, अग्रज्ञान, निर्भय ज्ञान, विवेक सागर, ज्ञानरत्न, अमरसार, ब्रह्म विवेक आपकी प्रमुख कृतियाँ हैं जिनमें ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, आत्मा-परमात्मा का सम्बन्ध तथा गुरुतत्व का निरूपण देखने को मिलता है।
भारतीय दर्शन में गुरु वह है जो जीव को अज्ञान से निकालकर ज्ञान के प्रकाश में स्थापित करता है। संत साहित्य में गुरु ईश्वर का प्रतिनिधि, सत्य का मार्गदर्शक, माया से मुक्ति दिलाने वाला, आत्मा-परमात्मा के बीच का सेतु, ज्ञानदाता है। दरिया साहब भी इसी व्यापक अवधारणा को स्वीकार करते हैं। आपके अनुसार ईश्वर का साक्षात्कार गुरू की कृपा के बिना सम्भव नहीं। वे कहते हैं कि ' गुरु बिन कौन बतावै बाटा। गुरु बिन मिटै न मन की खोटा।।' अर्थात् गुरू के बिना जीवन का मार्ग ज्ञात नहीं हो सकता और न ही मन के दोष दूर हो सकते हैं। उनके लिए गुरू केवल उपदेशक नहीं अपितु आत्मिक जागरण का स्रोत है। दरिया साहब साधारण गुरू और सदगुरु में भेद करते हैं। उनके अनुसार प्रत्येक गुरू जीव को मुक्ति नहीं दिला सकता केवल सदगुरु ही जीव को ब्रह्मज्ञान प्रदान करता है, उदाहरणार्थ-- ' सदगुरु मिले तो भेद बतावै, जन्म-मरण का फंद छुड़ावै।' सदगुरु मोक्ष का द्वार खोलता है, ब्रह्मज्ञानी, निष्काम, दयालु, आत्मानुभूति से सम्पन्न, नाम की महिमा का बोध कराने वाला और शिष्य को सत्य का मार्ग दिखाने वाला होता है।
दरिया साहब के दर्शन में गुरू और ब्रह्म में कोई भेद नहीं है। वे गुरू को ईश्वर का साकार रूप मानते हैं। उनकी दृष्टि में गुरु ब्रह्म का दूत है, गुरू के माध्यम से ही परमात्मा का ज्ञान सम्भव है। गुरू की कृपा से आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानती है और गुरू की कृपा से ही जीव ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। उनकी वाणी में-- ' गुरु सम और न दूजा कोई, जिन कृपा जीव ब्रह्ममय होई। ' जीव के परम प्राप्तव्य रूप में शब्द का दान करने के कारण दरिया साहब गुरु महिमा का बखान करने से नहीं अघाते, वे उनके प्रति अतिशय कृतज्ञ और समर्पित हैं। उन्होंने सदगुरु की आज्ञा को शिरोधार्य करके अपने मन को स्थिर किया जिसके फलस्वरूप समग्र संशय व पीड़ा मिट गई, मोहजनित अज्ञान नष्ट हो गया, यथा---
' सदगुरु ज्ञान दीपक बरै, जो मन होवे थीर। कह दरिया संशय मिटै, हरै सकल सब पीर।।' इसी कारण उनका कथन है कि लगन के साथ सदगुरू का ध्यान करना चाहिए। इस ध्यान के प्रभाव से प्राणी चिरयुवा होता है और उसे कभी मृत्यु की आशंका नहीं होती। वह केवलीभाव को प्राप्त करके सत्यलोक में प्रवेश पाता है। सदगुरु के पूजन से संसार के सभी देवताओं की पूजा हो जाती है,यथा--
' सदगुरु ध्यान रहो लवलाई, मिटहि जरा जिव जम नहिं खाई। ' दरिया साहब केवल आध्यात्मिक ज्ञान की ही बात नहीं करते बल्कि नैतिक जीवन को भी महत्व देते हैं। उनके अनुसार सदगुरु शिष्य में दया, क्षमा, सत्य, करुणा, अहिंसा व प्रेम के भाव को विकसित करता है, सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करता है।
कबीर, नानक तथा अन्य संतों की परम्परा से प्रभावित होते हुए भी आपने गुरुतत्व की अपने ढंग से व्याख्या की है। वे गुरू को आध्यात्मिक जीवन का आधार मानते हैं, सच्चे गुरू और ढोंगी गुरू में भेद करते हैं, आत्मज्ञान पर बल देते हैं, नाम साधना को महत्व देते हैं, जाति-पाँति और बाह्य भेदभाव से ऊपर उठकर समता का संदेश देते हैं। समकालीन संदर्भ में जहाँ मानव- मूल्यों पर संकट है, ऐसे समय में दरिया साहब की गुरु अवधारणा अत्यधिक प्रासंगिक है
- डाॅ०राकेश सक्सेना,
पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष,
68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001
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