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संतोष की राह: FOMO से JOMO तक, कुछ छूट जाने के डर से वर्तमान में जीने के आनंद तक की यात्रा -- डॉ. रीटा अरोड़ा , करनाल


 

विचारात्मक लेख : 

संतोष की राह: FOMO से JOMO तक, कुछ छूट जाने के डर से वर्तमान में जीने के आनंद तक की यात्रा


 “तुमने ट्रिप की तस्वीरें देखीं?” नेहा ने पूछा।

“हाँ, देखीं,” आरव ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

“अफसोस नहीं हुआ कि तुम नहीं गए?”

आरव ने अपनी किताब बंद की और कहा, “पहले जरूर होता। लेकिन इस सप्ताहांत मैंने माँ के साथ समय बिताया, पुरानी यादें ताज़ा कीं और खुद को भी समय दिया। लगता है, मैंने कुछ खोया नहीं, बल्कि बहुत कुछ पाया है।”

FOMO और JOMO आधुनिक जीवन के दो महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक विचार हैं।

FOMO (Fear of Missing Out) कुछ छूट जाने का डर-यह वह भावना है जब हमें लगता है कि दूसरे लोग हमसे बेहतर अनुभव कर रहे हैं, जीवन में आगे बढ़ रहे हैं या अधिक आनंद ले रहे हैं, और हम किसी महत्वपूर्ण अवसर से वंचित रह रहे हैं।

दोस्तों की विदेश यात्रा की तस्वीरें देखकर सोचना, "काश मैं भी गया होता।"

किसी की पदोन्नति देखकर महसूस करना, "मैं पीछे रह गया हूँ।"

सोशल मीडिया पर दूसरों की चमकदार जिंदगी देखकर अपनी जिंदगी अधूरी लगना।

FOMO हमें लगातार तुलना, बेचैनी और असंतोष की ओर धकेलता है।

JOMO (Joy of Missing Out)  कुछ छूट जाने का आनंद-यह FOMO का ठीक विपरीत है। इसमें व्यक्ति यह स्वीकार कर लेता है कि हर जगह मौजूद रहना, हर अनुभव लेना और हर अवसर को पकड़ना जरूरी नहीं है। वह अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार जीवन जीता है और जो छूट गया, उसके लिए परेशान नहीं होता।

सप्ताहांत की पार्टी छोड़कर परिवार के साथ शांत शाम बिताना।

सोशल मीडिया से दूर रहकर कोई अच्छी किताब पढ़ना।

दूसरों की उपलब्धियों से प्रेरित होना, लेकिन उनसे अपनी तुलना न करना।

JOMO हमें संतोष, मानसिक शांति और वर्तमान में जीने की क्षमता देता है।

FOMO कहता है: "सब लोग वहाँ हैं, मुझे भी वहाँ होना चाहिए।"

JOMO कहता है: "सब लोग वहाँ हैं, लेकिन मुझे यहीं रहकर खुशी मिल रही है।"

मान लीजिए, कोई व्यक्ति शनिवार रात एक पार्टी में नहीं गया। यदि वह घर बैठकर सोच रहा है, "पता नहीं वहाँ कितना मज़ा आ रहा होगा, मैं कितना कुछ मिस कर रहा हूँ..."- तो यह FOMO है।

लेकिन यदि वह चाय का कप लेकर किताब पढ़ रहा है और सोच रहा है, "कितना अच्छा है कि आज मुझे अपने लिए समय मिला..."- तो यह JOMO है।

FOMO हमें दूसरों की जिंदगी में भटकाता है और JOMO हमें अपनी जिंदगी में वापस लाता है।

 - डॉ. रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर

करनाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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