(7 जुलाई ) विश्व क्षमा दिवस :
क्रोध की आग को शांत करने के लिए क्षमा शीतल जल के समान है
- डॉ बी आर नलवाया, मंदसौर
शिक्षाविद एवं चिंतक
प्रस्तुति डॉ घनश्याम बटवाल
क्षमा या माफी एक ऐसी रामबाण दवा है, जो दिल
गहराई तक जाकर घावों का इलाज करती है। हाँ, जी , आपने सही पढ़ा है। मानव जीवन में सबसे कठिन यदि कुछ है, तो वह है, किसी को उसके अपराध के लिए क्षमा कर देना । हम जानते है, कि हर मनुष्य चाह कर भी दुख देने वाले लोगों । को हृदय से क्षमा नहीं कर पाते । क्षमा कर देने से सामने वाले व्यक्ति को ही हम पीड़ामुक्त नहीं करते,जबकि क्षमाशीलता हमारे व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास का मार्ग भी खोलती है। किसी भी गलती पर उसे क्षमा कर देना और अपनी गलती पर क्षमा मांग लेना, इस गुण की सार्थकता होती है। अपने आवेश और अपमान पर पूर्ण नियंत्रण कर सकने वाला व्यक्ति ही क्षमाशील हो सकता है।
आज विश्व क्षमा दिवस है। इस दिवस पर मनुष्य सभी जीवों को क्षमा करते है ,सबसे क्षमा याचना करते हैं, और कहते हैं, मेरे दुष्कृत्य, मिथ्या हो, मेरा किसी से वैर नहीं है। यहाँ यह स्पष्ट है, कि जैन परंपरा में पर्युषण महापर्व की समाप्ति के बाद क्षमा पर्व मनाया जाता है।
यहाँ श्रावक और साधु दोनों ही वार्षिक प्रतिक्रमण करने के पश्चात् पूरे वर्ष में उन्होंने जाने या अनजाने में यदि संपूर्ण ब्रह्मांड के किसी भी सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव के प्रति यदि कोई भी अपराध किया हो तो, उनसे वे क्षमा याचना करते हैं। अपने दोषों की निंदा करते है और कहते हैं- "मिच्क्छा मी दुक्कडम् "अर्थात मेरे सभी दुष्कृत्य मिथ्या हो जाए।
क्षमा याचना कहने या कर लेने से ही विश्व क्षमा दिवस की सार्थकता सिद्ध नहीं हो सकती। क्षमा को दिल में धारण करो, दुश्मन को भी दुश्मनी मित्रता में बदल कर एक मिसाल बन जाये। यहाँ छोटे-बड़े का सवाल नहीं है "क्षमा करना टूटे दिलों को जोड़ने से अर्थात वैर विरोध भाव को छोड़कर 'क्षमा के सेतु से प्रेम भाव जगाना ही सच्ची क्षमा याचना है। स्पष्ट है क्षमा दिखावे के लिए नहीं दिल में धारण करने से । क्षमा प्रत्येक इॅसान का फर्ज ही नहीं मानव धर्म भी है।। क्योंकि क्षमा नहीं करना, हमारे शरीर में हार्मोनल परिवर्तन पैदा करती है। जो शरीर के लिए घातक है। क्षमा माँगने में विलंब नहीं करना, नहीं तो क्षमा माँगना कठिन हो जाएगा। खुले दिल से अपनी गलती को स्वीकार कर लेना चाहिए। लेकिन कदाचित् वह अपनी गलती के लिए मॉफी नहीं मांगता है, तब भी आप अपनी ओर से अपने मन की शांति के लिए तो उसे माफ कर ही दीजिए। और उसके अपराध को अपने दिमाग से निकल दीजिए। इससे आपके मन पर बोझ नहीं रहेगा आपका दिल-दिमाग हल्का हो जाएगा। अन्यथा जो लोग द्वेषता से ग्रसित होते हैं ,उनमें हृदयगति के तेज होने की और बी पी की संभावना बढ़ जाती है। अपने मन के क्रोध से गंभीर मानसिक रोगों के शिकार भी जल्दी होते हैं। क्षमा में बहुत बड़ा बल है। क्रोध और प्रतिशोध की धधकती ज्वाला को शांत करने के लिए क्षमा शीतल जल के समान है।
मुंशी प्रेमचंद ने अपने उपन्यास मैं भी लिखा - "क्षमा का मार्ग टेढ़ा और कठिन है। क्योकिं क्षमा मानवीय भावों में सर्वोपरि स्थान रखती है। वही दया का स्थान इतना ऊँचा नही है। दया का मार्ग सीधा व सरल है।
महात्मा गाँधी ने लिखा है कि दंड देने की शक्ति होने पर भी दंड न देना क्षमा है। क्षमा और उदारता वही सच्ची है, जहाँ पर स्वार्थ की बलि दी जाती है। जिनका
रखती है। जिनका हृदय क्षमा से रहित है जो दूसरों को क्षमा करना नहीं जानते हैं, ऐसे लोगों का क्रोध चांडाल की तरह होता है । सज्जन व्यक्ति का क्रोध जल की तरंग के समान उठते ही शांत हो जाता है।
कुरान में भी क्षमा को एक महान साहस भरा कार्य बताया गया है। जो व्यक्ति धैर्य रखकर क्षमा कर देता है, निश्चित विवाह साहस का कार्य करता है।
महात्मा कबीर क्षमा को ईश्वर का रूप बताते हुए कहते हैं--
*जहाँ ज्ञान वहाँ धर्म है, जहाँ झूठ वहाँ पाप।
जहाँ क्रोध वहाँ काल है, जहाँ क्षमा वहाँ आप ।।*
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