लघुकथा :
आदत
बरसात की हल्की फुहारें पड़ रही थीं।
"पापा, आज मत जाइए," बेटे ने छाता आगे बढ़ाते हुए कहा, "पार्क की सारी बेंचें गीली होंगी।"
उन्होंने मुस्कराकर छाता लिया और धीरे-धीरे पार्क की ओर चल पड़े।
पार्क की वही पुरानी बेंच...
वही पेड़...
वही कोना...
बस, अब उसके पास बैठने वाली वह नहीं थी।
उन्होंने जेब से सिगरेट निकाली, जलाई और होंठों तक ले गए।
कुछ क्षण बाद मुस्करा दिए।
सिगरेट अब भी जल रही थी।
उसे छीनकर कूड़ेदान में फेंकने वाला हाथ अब कहीं नहीं था।
उन्होंने सिगरेट स्वयं ही बुझा दी और बेंच पर खाली जगह की ओर देखते हुए धीमे से बोले,
"देखो... आज भी तुम्हारी आदत नहीं गई।"
- डॉ अंजना गर्ग (सेवानिवृत)
म द वि रोहतक
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कथा कहानी
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