आलेख :
इच्छाओं की ईएमआई: जितना चुकाओ, उतना बढ़ता जाता है बकाया
सुख की तलाश में भागता मन अक्सर यह भूल जाता है कि शांति इच्छाओं की पूर्ति से नहीं, उन पर नियंत्रण से मिलती है।
सुबह की सैर के दौरान एक परिचित मिले। चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं। मैंने पूछा, “सब ठीक है?”
उन्होंने लंबी सांस लेते हुए कहा, “बस एक इच्छा पूरी हो जाए, फिर जिंदगी में कोई तनाव नहीं रहेगा।”
मैं मुस्कुरा दिया। क्योंकि यही वाक्य मैंने उन्हें पाँच साल पहले भी कहते सुना था। फर्क सिर्फ इतना था कि तब उनकी इच्छा एक कार की थी, फिर बड़ा घर, फिर बेहतर नौकरी, फिर विदेश यात्रा और अब कुछ नया।
हम दोनों कुछ देर चुप रहे। तभी मुझे लगा कि शायद जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि इंसान इच्छाओं को पूरा करके शांति ढूंढ़ता है, जबकि इच्छाएं पूरी होते ही नई इच्छाओं को जन्म दे देती हैं।
मनोविज्ञान इसे बहुत सरल शब्दों में समझाता है। मनुष्य का मन स्थिर नहीं रहता। उसे जो मिल जाता है, वह कुछ समय बाद सामान्य लगने लगता है। फिर वह अगले लक्ष्य, अगले सुख और अगले आकर्षण की ओर दौड़ पड़ता है।
यही कारण है कि जिस मोबाइल फोन को खरीदने के लिए हम महीनों तक उत्साहित रहते हैं, वही कुछ समय बाद साधारण लगने लगता है। जिस पदोन्नति के लिए हम वर्षों तक मेहनत करते हैं, उसे पाने के बाद कुछ ही दिनों में अगली सीढ़ी दिखाई देने लगती है।
इच्छाओं का स्वभाव नदी जैसा नहीं, बल्कि आग जैसा है। नदी समुद्र में जाकर शांत हो जाती है, लेकिन आग में जितना ईंधन डालो, वह उतनी ही भड़कती है।
समस्या इच्छाओं के होने में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब हम यह मान लेते हैं कि हमारी हर इच्छा पूरी होनी ही चाहिए।
एक छोटे बच्चे को देखिए। वह खिलौने की जिद करता है। खिलौना मिल जाता है तो कुछ दिनों बाद दूसरा चाहिए। फिर तीसरा। फिर कुछ और। उम्र बढ़ती है, लेकिन मन का यह पैटर्न नहीं बदलता। खिलौनों की जगह गाड़ियां, मकान, पद और प्रतिष्ठा ले लेते हैं।
दरअसल, अधिकांश लोग अपने मन में केवल एक ही संभावना रखते हैं—“जो मैं चाहता हूं, वह मुझे मिलकर ही रहेगा।”
यहीं से अशांति जन्म लेती है।
क्योंकि जीवन गणित की किताब नहीं है, जहां हर सवाल का एक निश्चित उत्तर हो। जीवन संभावनाओं का मैदान है। यहां सफलता भी संभव है और असफलता भी। प्राप्ति भी संभव है और अप्राप्ति भी।
लेकिन हम केवल प्राप्ति की कल्पना करते हैं।
जब वास्तविकता हमारी कल्पना के अनुरूप नहीं होती, तो दुख पैदा होता है।
ध्यान से देखिए, दुख का कारण अक्सर इच्छा नहीं होती, बल्कि उस इच्छा से जुड़ी हमारी अनिवार्यता होती है।
एक विद्यार्थी सोचता है कि उसे किसी विशेष संस्थान में प्रवेश मिलना ही चाहिए। एक कर्मचारी मानता है कि इस बार पदोन्नति मिलनी ही चाहिए। एक व्यापारी उम्मीद करता है कि उसका हर निवेश लाभ ही देगा।
जब ऐसा नहीं होता, तो मन टूट जाता है।
यदि वही व्यक्ति शुरुआत से दो संभावनाओं को स्वीकार कर ले-“यह हो भी सकता है और नहीं भी”-तो परिणाम चाहे जो हो, उसकी मानसिक शांति बनी रहती है।
एक बुजुर्ग संत ने एक बार बहुत सुंदर बात कही थी। उन्होंने कहा, “इच्छा रखो, लेकिन उसके साथ ‘कोई बात नहीं’ भी रखो।”
यह ‘कोई बात नहीं’ तीन शब्द नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन का मंत्र है।
यदि इच्छा पूरी हो जाए तो आभार व्यक्त करो।
यदि पूरी न हो तो स्वयं से कहो-“कोई बात नहीं, फिर कभी प्रयास करेंगे।”
यह दृष्टिकोण हार मानना नहीं है। यह जीवन को उसकी वास्तविकता के साथ स्वीकार करना है।
आज का समाज हमें लगातार यह संदेश देता है कि और अधिक पाओ, और अधिक बनो, और अधिक हासिल करो। लेकिन बहुत कम लोग यह बताते हैं कि मन की शांति का संबंध उपलब्धियों की संख्या से नहीं, बल्कि इच्छाओं पर नियंत्रण से है।
जिस व्यक्ति की इच्छाएं सीमित हैं, वह कम साधनों में भी प्रसन्न रह सकता है।
और जिसकी इच्छाएं असीमित हैं, वह अपार संसाधनों के बीच भी असंतुष्ट रह सकता है।
इतिहास गवाह है कि संसार के सबसे धनी लोगों में भी तनाव, चिंता और अकेलेपन की कमी नहीं रही। दूसरी ओर, साधारण जीवन जीने वाले अनेक लोग गहरी संतुष्टि और आनंद का अनुभव करते रहे हैं।
कारण स्पष्ट है।
सुख वस्तुओं की संख्या से नहीं, मन की स्थिति से पैदा होता है।
जीवन की गुणवत्ता इस बात से तय नहीं होती कि हमने कितना प्राप्त किया, बल्कि इस बात से तय होती है कि जो नहीं मिला, उसके साथ हमने कैसा व्यवहार किया।
आज यदि हम अपने मन को यह प्रशिक्षण दे दें कि “मेरी इच्छाएं पूरी हो भी सकती हैं और नहीं भी,” तो शायद जीवन की आधी अशांति समाप्त हो जाए।
इच्छाएं रखना स्वाभाविक है। प्रयास करना भी आवश्यक है। सपने देखना भी सुंदर है।
लेकिन यह समझना उससे भी अधिक आवश्यक है कि हर सपना तत्काल साकार नहीं होगा और हर इच्छा पूरी नहीं होगी।
जो व्यक्ति इस सत्य को स्वीकार कर लेता है, वह जीवन की दौड़ में भी शांत रहता है और ठहराव में भी संतुष्ट।
फंडा यह है कि इच्छाओं को पूरा करने की दौड़ का कोई अंतिम पड़ाव नहीं होता। इसलिए हर नई इच्छा के पीछे भागने से पहले अपने मन से पूछिए-क्या मुझे यह वस्तु चाहिए, या मुझे शांति चाहिए? क्योंकि इच्छाएं बढ़ने का स्वभाव रखती हैं, लेकिन शांति केवल नियंत्रण और स्वीकार्यता से मिलती है।
- डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
Tags:
विविध
.jpg)