आर्द्रा पर्व प्रकृति की पूजा का उत्सव है
- पद्मा मिश्र , जमशेदपुर
हमारा देश भारत विविध सतरंगी संस्कृतियों पर्वों परंपराओं का उत्सव धर्मी देश रहा है।प्रकृति के अनेक रुप कभी उग्र कभी कोमल ,कभी वर्षा की फुहारों में भींगती धरती तो कभी रंगों में डूबा और पूजा के गीतों से गूंजता परिवेश मानसिक शांति और संतुष्ट भी प्रदान करता है। वर्षा ऋतु यहां का प्रमुख पर्व है और किसान ग्राम देवता।वह धरती का उपकार है …श्रृंगार है ..समाज को श्रम व् लगन ,त्याग और तपस्या का सर्वोत्तम पाठ पढ़ाने वाला गुरु भी है तो युग निर्माता भी ।कवियों कृतिकारों की कल्पना का मुख्य विषय भी वर्षा ऋतु ही रही है।महाकवि जायसी ने 'चढा आषाढ गगन घन गाजा.साजा विरह दुंद दल बाजा"कहकर आषाढ के बादलों का स्वागत किया था तो साकेत में गुप्त जी ने उर्मिला के मुख से कहलाया था 'आओ हे घनश्याम। यशोधरा के गौतम तो लौटे पर हमारे देश की यशोधरा की सूना पंथ निहारती आंखों.में मेघों की प्रतीक्षा जैसे ठहर जाती है।आषाढ के बादलों को आकाश में उमडते घुमडते देखने की कल्पना , रोज सुबह प्रात:काल शीतल हवाओं और रिमझिम बूंदों का अहसास हमारे जीवन में उल्लास ले आता है। जिसकी प्रतीक्षा किसान, भूमिसुतायें करती हैं ताकि खेतों की हरियाली लौटे ,फसलों का वैभव लौटे।इसी आषाढ मास में बिहार उत्तर प्रदेश और देश के कई भागों में आर्द्रा नक्षत्र का स्वागत किया जाता है आर्द्रा नक्षत्र आर्द्र शब्द से लिया गया जिसका अर्थ है गीला या भींगने का भाव। नयी फसलों विशेष रुप से धान को बोने का समय ,आमों तथा अन्य मौसमी फलों फसलों के घर लाने का उत्सव ।इस दिन बरसते बादलों के बीच घर में तरह तरह के.व्यंजन बनाए जाते हैं।चने की दाल भरी पूरी ,खीर, कोंहडे या चने की सब्जी, आम ,मीठी चटनी आदि बनायी जाती हैभगवान शिव को भोग लगाकर पूरा परिवार इस उत्सव को मनाता है।आर्द्रा नक्षत्र का संबंध भगवान शिव के रुद्र रूप से है, जो विनाश और परिवर्तन के देवता हैं. रुद्र को आंधी, तूफान का स्वामी भी माना जाता है. यह भी माना जाता है कि जब सूर्य आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करता है, तो धरती रजस्वला होती है, और यह समय बीज बोने के लिए उपयुक्त माना जाता है. वर्षा ऋतु में लोकगीतों का विशेष महत्व रहता है।लोकगीत ही किसी देश की संस्कति व परंपरा के.प्राण होते हैं।जैसे उत्तर प्रदेश में कजरी।कजरी, उत्तर प्रदेश के अवध और पूर्वांचल क्षेत्र का एक प्रसिद्ध लोकगीत और लोक नृत्य है। यह गीत वर्षा ऋतु में गाया जाता है और इसे गाते समय नृत्य भी किया जाता है। कजरी में आमतौर पर प्रेम, विरह, और प्रकृति का वर्णन होता है। अरे रामा सावन में घनघोर बदरिया छायी हे हरी ।या शिवशंकर चले कैलाश बुंदियां पडने लगी।इन गीतों को धान बोते समय या झूला झूलते समय.भी सखियों मिलकर गाती है।बिरहा, बिहार में लोकप्रिय एक लोकगीत है। वर्षाकाल में गाए जाने वाले अन्य लोकगीतों में चैती और लंगुरिया भी शामिल हैं, के अनुसार Brainly.in. इसके अलावा, बुंदेलखंड में आल्हा, फाग, लामटेरा, दादरे, और गारी जैसे गीत भी गाए जाते हैं। प्रकृति संबंधी सृजन करने और खेती अकाल आदि की सटीक भविष्य वाणी करने वाले महाकवि घाघ याद आते.हैं ।उन्होने कहा था।घाघ रोहनी बरसे मृग तपे, कुछ दिन आर्द्रा जाय।कहे घाघ सुनु घाघिनी, स्वान भात नहिं खाय।।महा कवि घाघ अपनी पत्नी (भड्डरी) से कहते हैं कि अगर रोहिणी नक्षत्र में जोरदार तपन काल रहता है और मृगशिरा नक्षत्र में जोरदार आँधियाँ चले तथा आर्द्रा नक्षत्र के कुछ दिन बीतने पर अगर बरसात होती है तो इतना अच्छा समय आता है कि मनुष्य तो क्या श्वान(कुत्ता)भी भूखा नहीं रहता है। यह पर्व अत्यंत महत्वपूर्ण एवं लोकप्रिय है।कृषि प्रधान प्रदेशों में अनिवार्यत: अपनी सामर्थ्य के अनुसार इसे मनाते हैं।यह एक सामूहिकता का त्योहार भी है,जिसमें घर पर बने पकवान पूरे गाँव और इष्ट मित्र को भी बांटे जाते हैं।खेतों में धान बोने वाले मजदूरों और करमचारियों को भी भोजन कराया जाता है।ऐसे ऋतु पर्व हमारे देश की शान हैं और प्रकृति की अभ्यर्थना का उत्सव भी।
Tags:
विविध
.jpg)