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कुटुंब प्रबोधन–महिलाओं की बदलती भूमिका - डा सरित किशोरी , जमशेदपुर



कुटुंब प्रबोधन–महिलाओं की बदलती भूमिका

 - डा सरित किशोरी , जमशेदपुर

      महिलाओं की बदलती भूमिका, आर्थिक स्वतंत्रता, शिक्षा और रोजगार के अवसरों ने महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को सशक्त किया जिससे महिलाएं नेतृत्व करना चाहती हैं न कि किसी नेतृत्व के अधीन हों।
*व्यक्तिवाद की भावना पश्चिमी करण और वैश्वीकरण के प्रभाव से परिवारों में 'सामूहिकता 'की जगह 'व्यक्तिवाद 'बढ़ा है।कानूनी और सामाजिक सुधार -कानूनी रूप से उम्र का निर्धारण (बाल विवाह का निषेध अधिनियम ), हिन्दू विवाह या उत्तराधिकार अधिनियम जैसे कानूनों ने भी पारिवारिक संरचना और संपत्ति के अधिकारों को प्रभावित किया है। इसके अलावा प्रेम विवाह का प्रचलन और तलाक की बढ़ती दरो ने पारम्परिक ढांचे को नया रूप दे दिया।
संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक आते आते जन जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है । महिलाओं की आत्मनिर्भरता बढ़ी है और लैंगिक समानता को बढ़ावा मिला है, वहीं दूसरी ओर बच्चों की परिवारिश में, बुजुर्गो के मार्गदर्शन की कमी, आपसी सौहार्द, सहनशीलता के स्थान पर आक्रोश एवं असंतोष का तेजी से प्रभावी होता जा रहा है।पारिवारिक अलगाव जैसी चुनौतियां भी उत्पन्न हुई हैं।
*सकारात्मक प्रभाव में महिला स्वतंत्र, सशक्त हुई व्यक्तिगत विकास हुआ। नकारात्मक प्रभाव भी गहरा है, परिवार टूटने से बच्चों को दादा दादी, अन्य रिश्तेदारों का स्नेह व सांस्कृतिक मार्गदर्शन नहीं मिल पाता  जिससे प्राथमिक समजिकारण प्रभावित होता है।
माता पिता के काम में व्यस्त रहने के कारण बच्चों में  स्क्रीन (मोबाइल /टेक्नोलॉजी, टीवी )की लत जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं।
बदलते स्वरुप में एकल परिवार में वृद्ध जनों की सुरक्षा औऱ भावनात्मक समर्थन प्रभावित हुआ है, उनके लिए अकेलापन और अवसाद एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन कर उभरा है। बुजुर्गो की उपेक्षा तनाव और अकेलापन संकट के समय जहाँ पहले पूरा (संयुक्त )परिवार ढाल बनकर खड़ा होता था वहीं एकल परिवार होने के कारण लोगों को अकेले ही मानसिक आर्थिक दबाव को झेलना पड़ता है, ऐसी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
परिवार के बदलते इस स्वरुप ने जहाँ एक ओर आधुनिक स्वतंत्र जीवन शैली को जन्म दिया है वहीं दूसरी ओर आपसी पारिवारिक जुड़ाव और नैतिक समर्थन के पारम्परिक ताने बाने को कमजोर भी किया है। इसे सकारात्मक बनाना हमारी व समाज की जिम्मेदारी है।
 पारिवारिक मूल्यों में जो कमी आयी है उसे पुनः स्थापित करने का सतत प्रयास करना आवश्यक है।
 बच्चों और बुजुर्गों के साथ गुणवत्ता पूर्ण समय बितायें। संवाद (बात चीत )को मजबूत करना, पारिवारिक संस्कार देना और आवश्यकता पढ़ने पर काउंसलिंग लेना प्रभावी कदम है। संवाद और जुड़ाव बढ़ाये, अनुभवों को साझा करें। परिवार साथ रहे तो टीवी मोबाइल से दूर रहें। परिवारिक जुड़ाव के लिए यह समय बहुत महत्त्व पूर्ण है। बच्चों के लिए सकारात्मक माहौल बनाकर रखें। व्यस्त दिनचर्या से समय निकाल कर बच्चों के साथ खेलें या जो उसकी रूचि है उसमें शामिल हों और बुजुर्गों की उचित देख भाल की साझा जिम्मेदारी का निर्वाह करें। उन्हें अकेला न छोड़े थोड़ा समय जरूर दें, उन्हें सामाजिक गतिविधियों से जोड़े ताकि उनका अकेला पन दूर हौ सके।
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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