क्या प्यार अंधा होता है ?
- देवेन्द्र कुमार रावत , भोपाल
अभी हाल के समाचारों में ऐसी घटनाएं बहुत सामने आ रही हैं, जिनमें त्रिकोणीय प्रेम के कारण प्रेमी-प्रेमिका अपने अंधे प्यार में किसी की हत्या कर सोचते हैं कि वे आगे भी सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकेंगे । प्यार के संदर्भ में, साहित्य के अलावा चलचित्रों (फिल्मों) में भी बहुत से गीत और कविताएं लिखी गईं हैं , जिनमें "प्यार दीवाना होता है मस्ताना होता है" तो बहुत प्रसिद्ध है । लेकिन "प्यार अंधा नही होता है", इस विषय पर गीतकारों ने शायद ही कलम चलाई हो । काश! वे गीत की प्रथम पंक्ति में "प्यार दीवाना होता ,मस्ताना होता के साथ-साथ प्यार अंधा नही होता है" भी लिखते, तो प्रेमी कुछ सबक सीखते ? जिससे आए दिन प्रेम-त्रिकोण से ऐसी घटनाएं घटित नहीं होतीं, किन्तु इसी ज्ञान के अभाव में प्रेमी-प्रेमिका मिलकर अपने होने वाले मंगेतर या जिससे विवाह हो गया है, उसे भी जान से मारकर सुखी जीवन व्यतीत करने का सोचते हैं । पता नहीं प्रेमियों में यह कैसा अंधापन है कि एक-दो छोड़िए, दोनों की मिलाकर चार आंखें होते हुए भी वे यह नहीं देख पाते कि उनकी इस दीवानगी में जो अंधापन आया है, वह उन्हें ही पूरे जीवन भर जेल की चक्की पीसने पर मजबूर कर देगा । ऐसे कुकृत्यों से जहाँ 'प्रेम' शब्द कलंकित हुआ है, वहीं हमारी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था भी तार-तार हो गई है; क्योंकि ये प्रेमी तो अंधे हैं ही, लेकिन उनके परिजन भी अंधे हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को अच्छे संस्कार नहीं दिए और न ही वे यह देख पाए कि उनकी अपनी संतान के इरादे कितने खतरनाक हैं । अब तो ऐसे समाज प्रमुखों को भी अंधा कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी जो केवल पद प्रतिष्ठा पाने मात्र के लिए स्वयंभू समाज के अध्यक्ष बन कर राजनीतिक अंदाज में एक बड़ी कार्यकारिणी का गठन कर समझते है कि वे समाज सेवा कर रहे हैं । क्योकि ये भी ऐसे घटनाक्रमों को अनदेखा कर रहे हैं । समाज में पहले हीर-रांझा और लैला-मजनू के प्रेम के किस्से तो हम सबने सुने थे । प्रेम पर कवियों ने गीत भी लिखे, कहानियां और फिल्में भी बनीं, लेकिन उनके प्रेम की पवित्रता को लोग आदर देते थे; क्योकि इनके प्यार में तीसरे की कभी कोई गुंजाइश नहीं रही । परंतु प्यार के क्षेत्र में इन अनुभवहीनों को कौन समझाए कि इन्हें दूसरों की क्या, स्वयं के जीवन की भी चिंता नहीं है । हमारे में फिल्मी गीतकारों को भी "प्रेम या प्यार "के क्षेत्र में आध्यात्मिक ज्ञान का ही अभाव रहा है , जिसके कारण वे कांमांध को अंधा कहने का साहस नहीं जुटा पाए । जबकि लंकापति रावण के बारे में वर्णन आया है कि उसके 10 सिर और 20 आंखें होते हुए भी, वह अत्यंत सुंदर स्त्रियों को अपनी भुजाओं के बल पर जीतकर, मंदोदरी जैसी सुंदर रानी के होते हुए भी (सीता जी का) हरण करके ले आया था । इसीलिए अंगद ने तो भरे दरबार में उससे कह दिया था:-
"हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस ।
अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस ॥"
अर्थात् अंगद रावण से कहते हैं कि यह बात बिल्कुल सच है कि हम (वानर) तो अभी नासमझ बालक हैं, और तुम (हे दशानन रावण !) अपने महान राक्षस कुल के रक्षक और मुखिया हो । लेकिन तुम ऐसी बातें मत करो जैसे तुम अंधे और बहरे हो गए हो । तो आज के प्रेमियों को, जिनकी दो और दो मिलकर चार आंखें होती हैं, जब उन्हें आगे अपने जीवन में आने वाला तूफान दिखाई नहीं देता, तो इससे बड़ा आश्चर्य और क्या होगा ? लेकिन प्रेमियों ने फिल्मी गीतकारों की इस पंक्ति -"प्यार दीवाना होता है - को तो देखा, सुना और मनन किया, पर "प्यार अंधा नही होता है" इस संबंध में उन्होंने कभी भी धर्म-क्षेत्र में आए वर्णन का न तो अध्ययन किया और न ही इस बात को जाना । यही कारण है कि वर्तमान में इस तरह के प्रेम-त्रिकोण के मामलों में घटनाएं घट रही हैं । इसे इस संदर्भ में ऐसी दृष्टि दोष दूर करने के लिए कोई बाहय चिकित्सा पद्धति काम की नहीं है , न ही अभी तक ऐसा कोई चश्मा भी बना है जो इनकी दृष्टि ठीक कर सके । इस दृष्टि दोष की चिकित्सा तो 'धर्म' में है । धर्म द्वारा प्रदत्त ज्ञान से ही प्यार में अंधे लोगों को शिक्षा मिलती है । अब प्रश्न यह है कि यह ठीक कैसे हो ? इसमें दंड व्यवस्था से हम सुधार की आशा तो रखते हैं, पर अब तक इस क्षेत्र में दंडित किए गए लोगों की संख्या को देखते हुए पूर्ण सुधार आ जाएगा, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता । दंड व्यवस्था आवश्यक तो है, लेकिन इसके साथ ही जीवन में धर्म-व्यवस्था की भी आवश्यकता है । हमारे धर्मशास्त्रों में ऐसे लोगों को 'कामांध' की श्रेणी में रखा जाता है । वर्णन आया है कि यह विषय (वासना) सर्प के समान है । विषयों को सर्प की संज्ञा देने के पीछे अध्यात्मवेत्ताओं को यह ज्ञान भी था कि जिसे यह सर्प डस लेता है, उसे जहर चढ़ने के कारण आंखों से दिखाई नहीं देता । जबकि प्रेम में चकोर की तरह अपने प्रिय से दृष्टि हटती ही नहीं है । प्रेम में पवित्रता होती है, जिसकी गली इतनी संकरी होती है कि उसमें कोई दूसरा आ ही नहीं सकता । किंतु किसी तीसरे के आने से ही ये दुर्घटनाएं घट रही हैं । हमारी संस्कृति में इसीलिए काम (वासना) को संयमित करने की बात बार-बार कही गई है । यदि हमारे जीवन में काम नियंत्रित है, तो हमारा जीवन सुरक्षित है । यदि ऐसा नहीं होता, तो मनुष्य और पशुओं में कोई अंतर नहीं रह जाता है । इसलिए प्यार के संबंध में गीतकारों को गीत लिखने में यह सावधानी होनी चाहिए थी कि "प्यार दीवाना , मस्ताना तो होता है" लेकिन प्यार अंधा नहीं होता है ।
महेंद्रा स्कावयर्स
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