राष्ट्र सेविका समिति' का उद्भव
और मौसी जी
- विवेक रंजन श्रीवास्तव , लंदन
भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण के इतिहास में 'राष्ट्र सेविका समिति' का उद्भव एक ऐसी घटना है जिसने राष्ट्रवाद की वैचारिक धारा में मातृशक्ति की भूमिका को एक नई परिभाषा दी। इस संस्था की सूत्रधार थीं श्रीमती लक्ष्मीबाई केलकर, जिन्हें देश भर में 'मौसी जी' के नाम से संबोधित किया जाता है। वे हेडगेवार जी के विचारों से प्रभावित रहीं
मौसी जी का जीवन व्यक्तिगत यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय नारी के संगठित उत्थान का एक जीवंत महाकाव्य है।
1905 में नागपुर में जन्मी लक्ष्मीबाई केलकर ने बहुत कम उम्र में ही जीवन की कठोर वास्तविकताओं का अनुभव कर लिया था। पति के असामयिक निधन के बाद, उन्होंने व्यक्तिगत शोक को राष्ट्र-प्रेम के विराट संकल्प में रूपांतरित कर दिया। उनका यह स्पष्ट मानना था कि राष्ट्र की उन्नति का मार्ग परिवार से होकर गुजरता है, और परिवार की धुरी 'स्त्री' है। जब तक स्त्री वैचारिक रूप से प्रबुद्ध, शारीरिक रूप से सक्षम और सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ नहीं होगी, तब तक एक सशक्त राष्ट्र की कल्पना अधूरी है।
इसी दूरदर्शी सोच के साथ 1936 में विजयादशमी के पावन पर्व पर उन्होंने 'राष्ट्र सेविका समिति' का बीजारोपण किया।
मौसी जी का व्यक्तित्व एक अद्भुत विरोधाभास और संतुलन का मिश्रण था। वे एक ओर अत्यंत ममतामयी 'मौसी' थीं, तो दूसरी ओर अनुशासित और अडिग संकल्प वाली एक महान संगठक।
उनके विचार अत्यंत व्यावहारिक थे। उनका कहना था कि यदि पुरुष की शिक्षा केवल एक व्यक्ति का विकास करती है, तो स्त्री की शिक्षा संपूर्ण परिवार को संस्कारित कर राष्ट्र के निर्माण का आधार बनती है। उन्होंने शक्ति का अर्थ केवल शारीरिक बल तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे धर्म और सत्य की रक्षा हेतु धैर्यपूर्ण समर्पण के रूप में परिभाषित किया।
राष्ट्र सेविका समिति की कार्यपद्धति में भी यही वैचारिक कसावट दिखाई देती है। 'शाखा' के माध्यम से उन्होंने महिलाओं को मात्र घर की चारदीवारी से निकालकर राष्ट्र के व्यापक फलक से जोड़ा। यहाँ शारीरिक व्यायाम और निपुणता के अभ्यास के साथ-साथ बौद्धिक विमर्श का एक ऐसा वातावरण निर्मित किया गया, जहाँ प्राचीन भारतीय मूल्यों का आधुनिक आवश्यकताओं के साथ सामंजस्य बिठाया जा सके।
आज यह संस्था न केवल शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सेवा कार्यों में संलग्न है, बल्कि आपदा प्रबंधन और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी एक मील का पत्थर बनी हुई है।
मौसी जी का जीवन हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी यदि ध्येय स्पष्ट हो, तो स्त्री शक्ति राष्ट्र के भाग्य को बदलने की अद्भुत क्षमता रखती है। उन्होंने बिना किसी दिखावे या शोर-शराबे के, केवल सेवा और संस्कार के माध्यम से समाज में जो वैचारिक बीज बोए थे, वे आज एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुके हैं।
राष्ट्र सेविका समिति आज भी उन्हीं आदर्शों को आत्मसात कर आगे बढ़ रही है, जिसे मौसी जी ने अपना सर्वस्व समर्पित कर पोषित किया था।
वे इसका उदाहरण बनी कि एक संकल्पित नारी किस प्रकार युग परिवर्तन की संवाहक बन सकती है।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव
लंदन
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