काव्य :
संशय से यकीं तक
दिल के वीराने में अक्सर
अजब सा संशय गूंजा करता !
हर बार जो कहता सरगोशी से
क्या सचमुच है कोई ख़ुदा !
एक रोज़ रूह ने हँसकर
मुझको एक राज़ बताया !
जिसको बाहर ढूंढ रही हो
उसने अंदर ही तुझमें घर किया !
वो ही मंदिर और मस्जिद में
वो ही सजदा और पूजा में!
संशय के सब प्रश्न मिटे
जब इश्क ने उसके हौले से छुआ !
अब न मंज़िल अब न राही
अब न दूरी अब न फ़ास !
जिसको पाने निकली थी मैं
वो तो बैठा है मेरे ही पास !
संशय की हर रात पिघल कर
यकीं की सुबह में ढल गयी !
मैं जब अपने भीतर उतरी
मेरी रूह खुदा से मिल गयी !
- साधना
अरविंद विहार
भोपाल
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