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अपने भीतर के माली को जगाइए - डॉ. रीटा अरोड़ा सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल



आलेख :

अपने भीतर के माली को जगाइए

हरियाली केवल पेड़ों से नहीं, संवेदनशील विचारों और जिम्मेदार व्यवहार से भी जन्म लेती है।

कुछ दिन पहले मैं एक पार्क में टहल रही थी। एक माली बड़ी तल्लीनता से पौधों की छँटाई कर रहा था। मैंने सहज ही पूछा, “इतनी मेहनत करते हैं, फिर भी कुछ पौधे सूख जाते होंगे। बुरा नहीं लगता?”

वह मुस्कुराया और बोला, “मैडम, मेरा काम हर पौधे को बचाना नहीं, हर दिन उसकी देखभाल करना है। जो बच जाता है, वह बगीचे की शोभा बढ़ाता है। और जो नहीं बच पाता, वह मुझे अगली बार और बेहतर देखभाल करना सिखा जाता है।”

उसकी बात सुनकर लगा कि यह केवल एक माली की सोच नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है।

हम सब अपने-अपने जीवन के माली हैं।

फर्क सिर्फ इतना है कि कोई मिट्टी में पौधे उगाता है और कोई अपने व्यवहार, संस्कार और विचारों में।

एक माली जानता है कि केवल बीज बो देने से बगीचा नहीं बनता। समय पर पानी देना पड़ता है, खरपतवार हटानी पड़ती है, धैर्य रखना पड़ता है और मौसम के उतार-चढ़ाव भी सहने पड़ते हैं।

ठीक यही नियम जीवन पर भी लागू होता है।

यदि हम चाहते हैं कि हमारे परिवार में प्रेम बना रहे, बच्चों में अच्छे संस्कार आएँ, समाज में संवेदनशीलता बढ़े और प्रकृति सुरक्षित रहे, तो हमें भी अपने भीतर के माली को जगाना होगा।

आज हम पेड़ लगाने के कार्यक्रम तो बड़े उत्साह से करते हैं, लेकिन क्या कभी अपने व्यवहार में भी हरियाली लाने का प्रयास करते हैं?

कड़वे शब्द बोलकर हम रिश्तों की मिट्टी को बंजर बना देते हैं। ईर्ष्या और अहंकार की खरपतवार इतनी तेजी से फैलती है कि प्रेम और विश्वास के पौधे पनप ही नहीं पाते।

हम पर्यावरण बचाने की बात करते हैं, लेकिन पानी की एक टोंटी खुली छोड़ देते हैं। प्लास्टिक का उपयोग कम करने की सलाह देते हैं, लेकिन सुविधा के लिए स्वयं नियम तोड़ देते हैं।

यही वह जगह है जहाँ हरित चेतना केवल अभियान नहीं, जीवनशैली बननी चाहिए।

एक शिक्षक अपने विद्यार्थियों से हर वर्ष एक पौधा लगवाते थे। लेकिन साथ ही एक शर्त भी रखते थे।

वे कहते, “पौधा लगाना आसान है। अगले एक वर्ष तक उसकी देखभाल करना तुम्हारी परीक्षा है।”

वर्ष के अंत में कुछ पौधे हरे-भरे होते, कुछ सूख चुके होते।

शिक्षक अंक पौधे की ऊँचाई देखकर नहीं देते थे। वे यह देखकर देते थे कि बच्चे ने उसकी देखभाल कितनी ईमानदारी से की।

क्योंकि जीवन में भी परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण हमारी जिम्मेदारी होती है।

आज आवश्यकता केवल अधिक पेड़ लगाने की नहीं है। आवश्यकता ऐसे मन तैयार करने की है, जो पेड़ों का महत्व समझें। ऐसे बच्चे तैयार करने की है, जो पौधों को सजावट की वस्तु नहीं, जीवन का आधार मानें।

बच्चे वही सीखते हैं, जो वे घर में देखते हैं।

यदि वे माता-पिता को पेड़ लगाते, पानी बचाते, पक्षियों के लिए दाना-पानी रखते और प्रकृति के प्रति सम्मान दिखाते हुए देखेंगे, तो उन्हें अलग से पर्यावरण शिक्षा देने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।

संस्कार हमेशा शब्दों से नहीं, व्यवहार से आते हैं।

प्रकृति का नियम भी यही है। एक विशाल वृक्ष हजारों फल देता है, लेकिन स्वयं उनमें से एक भी नहीं खाता। नदी प्यासे से कभी उसका परिचय नहीं पूछती। बादल बरसते समय खेतों में भेदभाव नहीं करते।

प्रकृति हमें हर दिन निस्वार्थ सेवा का पाठ पढ़ाती है।

शायद इसलिए जो व्यक्ति प्रकृति के अधिक निकट होता है, वह भीतर से भी अधिक शांत और संतुलित दिखाई देता है।

आज दुनिया तकनीक में आगे बढ़ रही है, लेकिन यदि हमारे विचार कठोर और व्यवहार प्रदूषित हो जाएँ, तो केवल शहरों की हरियाली बढ़ाने से समाज हरा-भरा नहीं होगा।

सच्ची हरित क्रांति तब आएगी, जब हमारे भीतर करुणा के पौधे, संवेदनशीलता के वृक्ष और जिम्मेदारी की जड़ें मजबूत होंगी।

तब हम केवल अपने लिए नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सोचेंगे।

हम उन्हें केवल एक सुंदर घर नहीं, बल्कि स्वच्छ हवा, शुद्ध जल, हराभरा वातावरण और मानवीय मूल्यों से भरा समाज देकर जाएँगे।

यही वह विरासत होगी, जिसकी कीमत आने वाले वर्षों में किसी भी संपत्ति से कहीं अधिक होगी।

*फंडा यह है कि पेड़ लगाना पर्यावरण की सेवा है, लेकिन अपने भीतर के माली को जगाना मानवता की सेवा है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर के माली को जागृत कर ले, तो हरियाली केवल बगीचों में नहीं, हमारे विचारों और व्यवहार में भी दिखाई देगी। यही हरित चेतना आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे सुंदर विरासत सिद्ध होगी।*

-  डॉ. रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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