काव्य :
प्रतिकार कर मृग
मरमरी सौंदर्य,
आंखों में भय।
घुटी घुटी चीख,
अंग सभी निष्क्रिय।
घोर अंधकार में,
बोलता है मौन।
वधिक का आखेट,
बंदी मृग कौन?
चाहे तू तेरह,
या हो तिरपन-
वधिक को चाहिए
नर्म तन, मौन क्रंदन।
प्रतिकार कर मृग!
सबल समर्थ हो।
तोड़ दे वे हाथ,
जिनका दूषित स्पर्श हो।
-डाॅ. सुधा कुमारी
नई दिल्ली
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