काव्य :
बोलती लड़की
बोलती लड़की
घर की दीवारों पर धब्बा बन गई
हँसती लड़की
मोहल्ले की हवस बन गई,
चुप लड़की
कायर कहलाने लगी,
और जो रो पड़ी
कमज़ोर।
माँ बोली -
“बेटी, सम्हल कर चलना,
दुनिया बदलती नहीं इतनी जल्दी”
बेटी बोली -
माँ, अगर तुमने चलना शुरू किया होता,
तो शायद आज मुझे दौड़ना पड़ता ही नहीं
अब लड़की ने कपड़े बदले नहीं,
नज़रिया बदला,
अब वह ‘सहने’ की बजाय
‘टोकने’ लगी है,
और यही सबसे बड़ा अपराध हो गया।
लड़की अभिशाप नहीं
क्योंकि वह घर नहीं,
अपना नाम बुन रही है,
उसका यूटोपिया
अब रसोई नहीं,
कला, विज्ञान, राजनीति, जंगल
पर्वत और सड़कों पर भी है।
लड़कियां जान गई हैं
परचम बनाने का तरीका
और परचम के साथ चलने का सलीका .
- सरिता सिंह ,गोरखपुर
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