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खामोश वैचारिक पदयात्रा: दीनदयाल का अंत्योदय- विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल


खामोश वैचारिक पदयात्रा: दीनदयाल का अंत्योदय

- विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल

इतिहास की धूल-भरी पुस्तकों में महापुरुषों को अक्सर पत्थर की मूर्तियों की तरह दर्ज किया जाता है—ठोस, अडिग और लगभग भावशून्य। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का नाम लेते ही मन में ‘एकात्म मानववाद’ की गंभीर शब्दावली उभरती है, पर उनके जीवन और चिंतन को केवल राजनीतिक सिद्धांत के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं है। उन्हें समझना उस मौन दार्शनिक से संवाद करना है, जिसने शोर के युग में खामोशी को अपनी शक्ति बनाया।

हम प्रायः उनके व्यक्तित्व को राजनीति की चकाचौंध में देखते हैं, जबकि उनकी असली छाप उस सादगी में है जो उनके आचरण, दृष्टि और जीवन-शैली में झलकती थी। उनका संयम, उनका आत्मानुशासन और साधारण जन के प्रति उनकी गहरी संवेदना केवल व्यक्तिगत गुण नहीं थे; वे उनके दर्शन की जीवंत अभिव्यक्ति थे। वे उस अकिंचन दृष्टि के प्रतिनिधि थे, जिसमें सत्ता का आकर्षण नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा केंद्र में रहती है। उनके लिए अंत्योदय कोई राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि एक गहरा मानवीय आग्रह था—समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को गरिमा और अवसर देना।

कल्पना कीजिए उस विचारक की, जिसने सत्ता के शीर्ष पदों को नहीं भोगा, फिर भी भारतीय राजनीतिक चिंतन पर गहरी और स्थायी छाप छोड़ी। उन्होंने व्यक्ति को समाज से अलग, अकेली इकाई मानने से इनकार किया। उनके लिए मनुष्य केवल आर्थिक उपभोक्ता नहीं, बल्कि शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समन्वित रूप था। इसी समग्र दृष्टि से उन्होंने ‘एकात्म मानववाद’ का प्रतिपादन किया, जिसमें व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच गहरा अंतर्संबंध स्वीकार किया गया। यह विचार आधुनिक युग के उस विखंडन के विरुद्ध एक शांत, पर दृढ़ प्रतिरोध था, जिसमें मनुष्य तकनीक का उपयोग करते-करते स्वयं तकनीक-निर्भर और भीतर से बिखरा हुआ होने लगता है।

आज के डिजिटल युग में हम ‘कनेक्टिविटी’ को उपकरणों और मंचों से मापते हैं, जबकि संबंधों की वास्तविकता कई बार उससे दूर होती जाती है। दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन इस स्थिति को एक भिन्न दृष्टि से देखने का आग्रह करता है। यदि समाज का एक भी अंग पीड़ित है, तो सम्पूर्ण समाज स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। यह केवल राजनीतिक अर्थशास्त्र की भाषा नहीं, जीवन की जैविक और नैतिक सच्चाई है। उनका दर्शन हमें याद दिलाता है कि विकास का मूल्यांकन केवल उत्पादन, उपभोग या गति से नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक आत्मबोध से होना चाहिए।

उनकी मृत्यु ने भी भारतीय सार्वजनिक जीवन में एक अनुत्तरित प्रश्न छोड़ दिया। 11 फरवरी 1968 की रात मुगलसराय रेलवे स्टेशन के पास उनका शव मिला, और इसके बाद उनकी मृत्यु को लेकर लंबे समय तक अनेक शंकाएँ और चर्चाएँ बनी रहीं। यह केवल एक व्यक्ति की असामयिक मृत्यु नहीं थी, बल्कि उस विचार की भी परीक्षा थी जिसे उन्होंने जीवन भर साधा। परंतु विडंबना यह रही कि देह चली गई, विचार रह गया। शायद यही कारण है कि आज भी उनका नाम केवल एक राजनीतिक नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक वैचारिक प्रेरणा के रूप में स्मरण किया जाता है।

आज जब हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल शोर और उपभोक्तावादी स्पर्धा के बीच अपनी पहचान तलाश रहे हैं, तब दीनदयाल उपाध्याय का ‘स्व’ का बोध और भी प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने न पश्चिम का अंधानुकरण किया, न परंपरा को जड़ता में बदलने की वकालत की। उनका आग्रह था कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े बिना कोई समाज सार्थक प्रगति नहीं कर सकता। यही कारण है कि उनका विचार आज भी उन युवाओं के लिए दिशा-सूचक की तरह है जो आधुनिकता और आत्मपहचान के बीच संतुलन खोज रहे हैं।

अंततः, दीनदयाल उपाध्याय पर लिखा गया हर शब्द कुछ अधूरा-सा लगता है, क्योंकि वे ऐसी विभूति थे जिन्हें परिभाषाओं में समेटना सरल नहीं। उन्होंने समाज को आँकड़ों, नारों और सत्ता-समीकरणों से देखने के बजाय मानवीय संवेदना की दृष्टि दी। वे उन गलियों में आज भी जीवित प्रतीत होते हैं जहाँ उपेक्षा है, उन आँखों में जहाँ उम्मीद अभी शेष है, और उन चेहरों पर जहाँ गरिमा की लौ अब भी टिमटिमा रही है। वे केवल एक विचार नहीं, एक जीवंत नैतिक उपस्थिति थे। उन्हें समझने का सर्वोत्तम मार्ग यही है कि हम अंत्योदय की उस यात्रा में एक छोटा-सा कदम बढ़ाएँ, जिसके लिए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया।

 - विवेक रंजन श्रीवास्तव
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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