राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: विचार, विकास और रचनात्मक यात्रा
- विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
भारत का राष्ट्रीय जीवन राजनीतिक संघर्षों के साथ ही सामाजिक तथा सांस्कृतिक प्रयासों से भी आकार ग्रहण करता रहा है। समाज को संगठित करने, राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को सुदृढ़ करने का कार्य अनेक संगठनों तथा जनांदोलनों ने किया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) इसी राष्ट्र सेवा की परंपरा का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। लगभग एक शताब्दी पूर्व स्थापित यह संगठन आज भारतीय समाज, संस्कृति और सार्वजनिक जीवन में व्यापक प्रभाव रखने वाले संगठनों में से है। इसके कार्य, विचार और भूमिका को लेकर जहाँ व्यापक समर्थन मिलता है, वहीं वैचारिक विमर्श और आलोचनाएँ भी होती रही हैं। इसलिए संघ का अध्ययन किसी पूर्वाग्रह से नहीं, बल्कि उसके ऐतिहासिक संदर्भ, वैचारिक आधार, सामाजिक योगदान और चुनौतियों के समग्र विश्लेषण के माध्यम से किया जाना चाहिए।
बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों का भारत राजनीतिक पराधीनता के साथ-साथ सामाजिक विखंडन की पीड़ा से भी गुजर रहा था। इन्हीं परिस्थितियों में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने वर्ष 1925 में विजयादशमी के अवसर पर नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। डॉ. हेडगेवार का विश्वास था कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसका संगठित और चरित्रवान समाज होता है। इसी विचार के आधार पर संघ ने दैनिक शाखा की कार्यपद्धति विकसित की, जहाँ शारीरिक प्रशिक्षण के साथ-साथ नैतिक शिक्षा, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रभक्ति के संस्कार दिए जाने लगे। यह उल्लेखनीय है कि संघ की इन शाखाओं में सम्मिलित होने के लिए किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता। यह कार्य पूर्णतः नि:शुल्क, स्वैच्छिक और सेवा भाव पर आधारित है, जहाँ अनुशासन ही एकमात्र प्रमुख तत्व है।
संघ की विचारधारा का मूल आधार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। संघ भारत को केवल एक राजनीतिक राष्ट्र नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से विकसित एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में देखता है। संघ की कार्यपद्धति में उत्सवों का विशेष महत्व है। वर्ष भर में छह प्रमुख उत्सव मनाए जाते हैं—वर्ष प्रतिपदा, हिंदू साम्राज्य दिवस, गुरु पूर्णिमा, रक्षा बंधन, विजयादशमी और मकर संक्रांति। इनमें विजयादशमी का विशेष महत्व है क्योंकि इसी दिन संघ की स्थापना हुई थी। ये उत्सव समाज में सांस्कृतिक मूल्यों की निरंतरता बनाए रखने और सामाजिक समरसता के सूत्र को मजबूत करने का कार्य करते हैं।
संघ की यात्रा केवल वैचारिक नहीं, अपितु राष्ट्रीय संकटों के समय सेवा की रही है। चाहे 1962 का भारत-चीन युद्ध हो अथवा 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध, संघ के स्वयंसेवकों ने नागरिक सुरक्षा, राहत कार्यों, सेना के लिए रक्तदान और सीमावर्ती क्षेत्रों में रसद पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1962 के युद्ध के दौरान दिल्ली में स्वयंसेवकों की अनुशासित सेवा को देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गणतंत्र दिवस की परेड में संघ को औपचारिक रूप से आमंत्रित किया था। यह स्वयंसेवकों की उस राष्ट्र-समर्पण की भावना को दर्शाता है जो किसी भी विपरीत परिस्थिति में समाज के साथ खड़ी रही है।
प्राकृतिक आपदाओं, जैसे गुजरात भूकंप, उत्तराखंड आपदा, सुनामी, केरल बाढ़ और कोविड-19 महामारी के दौरान भी स्वयंसेवकों की राहत गतिविधियों का उल्लेख अनेक स्रोतों में मिलता है। इसके अतिरिक्त, संघ के सामाजिक समरसता के प्रयासों में अस्पृश्यता के विरुद्ध सामूहिक भोजन और ग्राम विकास की परियोजनाएं निरंतर गतिशील हैं।
संघ की लगभग सौ वर्ष की यात्रा संघर्षों से भी परिपूर्ण रही है। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद प्रतिबंध, 1975 के आपातकाल का विरोध और 1992 की अयोध्या घटना जैसे मोड़ इसके इतिहास के चुनौतीपूर्ण अध्याय रहे हैं। इन घटनाओं ने संघ को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में रखा।
समकालीन भारत में संघ का प्रभाव शिक्षा, सेवा, जनजातीय विकास और सांस्कृतिक जागरण के विविध क्षेत्रों में व्याप्त है। वस्तुतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मूल्यांकन केवल प्रशंसा या आलोचना के आधार पर नहीं किया जा सकता। एक शताब्दी की यात्रा यह सिद्ध करती है कि उसने भारतीय समाज के संगठन और सेवा क्षेत्र में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। नई पीढ़ी को यह जानने की जरूरत है कि समाज के प्रति समर्पण का भाव और नैतिक आचरण किस प्रकार व्यक्ति को राष्ट्र निर्माण का आधार बनाते हैं। किसी भी राष्ट्र की परिपक्वता उसके विविध विचारों को समझने और उनका निष्पक्ष मूल्यांकन करने की क्षमता में निहित होती है।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव
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