ad

काव्य : महॅंगाई की मार - मोनिका डागा “आनंद", चेन्नई


काव्य : 

महॅंगाई की मार

रोज मिल रहे हैं बस नए-नए ज़ख्म,
किसे कहें अपना दर्द खुलकर हम, 
आम आदमी तो टूट रहा है हर दिन,
दैनिक जीवकोपार्जन है बड़ा कठिन ।

कमर तोड़ती हुई ये महॅंगाई की मार,
चक्रवृद्धि ब्याज सी दरें बढ़ती तीव्र धार,
आमदनी होती जा रही धीरे-धीरे कम,
महॅंगाई ने भैया कर रखा नाक में दम ।

सरकारें बस बदलती और बनती है नई,
पर महॅंगाई पर अंकुश नहीं लगाता कोई,
आम आदमी को देते हैं झॉंसा अक्सर, 
सब स्वविकास की दौड़ में है बस तत्पर ।

सोना-चॉंदी ख़्वाबों में भी नहीं खरीद सकें,
पहले दाल-रोटी तो नसीब से पूरी मिल सकें,
आम आदमी केवल बोझा ढोता रहता सारा ,
पेट्रोल गैस राशन तेल सबने बार-बार मारा ।

गरीबी की रेखा से है ऊपर पर अमीर कहॉं,
तड़पता खड़ा उसी बिन्दु पर बरसों से वहॉं,
चिंताओं के घेरे में व्याकुल किस्मत को कोसें,
जीवन "आनंद" मिल सकता कभी क्या उसे ।

अमीरों को नहीं पर पड़ता हैं ज्यादा फर्क,
आम आदमी देखता जीवन को होते नरक,
बस चुनावों के समय बनाया जाता महाराजा,
काम निकलते ही सरकारें बजाती उसका बाजा ।

-मोनिका डागा “आनंद", चेन्नई

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post