एक बार मोक्ष की यात्रा शुरू होती है फिर लौटना नहीं होता है - आचार्य समयसागर महाराज
इटारसी। जैन धर्म के आचार्य समयसागर महाराज ने कहा, समय कभी रुकता नहीं है। गत वर्ष हमें जबलपुर में वर्षायोग प्रवास मिला था। वहां से धीरे-धीरे विहार करते हुए मुक्तागिरि की ओर यात्रा हो गई। सिद्ध क्षेत्र की वंदना करने फिर विहार हुआ। नागपुर जाना हुआ। ग्रीष्मकालीन समय वहां स्वाध्याय में व्यतीत किया । पुनः विहार कर मुनि संघ इटारसी आया। बैतूल से गंतव्य के लिए एक सीधा भी रास्ता था। पर इटारसी के श्रावक अपने भावों को लेकर हमारे समक्ष आए। यहां वर्षायोग कर रहे आर्यिका संघ ने भी अपनी भावना प्रेषित की। इसलिए सहज भाव से पैदल विहार करते हुए यहां आ गए।
आचार्यश्री यहां न्यास कॉलोनी के महावीर परिसर में प्रवचन दे रहे थे। सोमवार को आचार्यश्री व पांच मुनियों ने केश लोंच कर उपवास रखा। शाम को गोधूलि बेला में गुरुभक्ति हुई।
वे बोले, चातुर्मास में चार माह व्यतीत होते हैं। यह जीवन मिला है साधना करते के लिए, धर्म ध्यान करने के लिए। कलिकाल में गुरुदेव विद्यासागर ने जो साधना की है। वह अनूठी है।
आचार्य समय सागर महाराज ने कहा साधना के समय भीड़ एकत्रित होती है। भीड़ चली भी जाती है। पर गुरुदेव ने कहा था, भीड़ में रहते हुए भी नीड़ को भूलना नहीं चाहिए। अर्थात् अपने आत्मतत्व को कभी नहीं भूलें।
हमें काफी समय गुरुदेव का सान्निध्य मिला है। अब वे हम सभी के बीच से चले गए हैं। आगम की दृष्टि में यह विचार आता है कि वियोग और संयोग होता है। मेरा विश्वास है पर प्रत्येक व्यक्ति जो गुरुदेव का भक्त माना जाता है उसके भीतर, हृदय में गुरु विराजमान हैं। वे अभी भी विद्यमान हैं। उनका प्रतिपल स्मरण होता है। उनकी आराधना होती है।
आचार्यश्री बोले, परिभ्रमण और यात्रा में अंतर है। एक बार मोक्ष की यात्रा शुरू होती है फिर लौटना नहीं होता है। लेकिन संसारी प्राणी हमेशा परिभ्रमण करता आया है। यात्रा पूर्ण तब होगी जब मोह पराजित होता है।
आत्मा की जीत होती है।
है। साधना की सीमा तब तक है जब तक साध्य की उपलब्धि न हो जाए। श्रावक धरती पर बैठे हैं पर उनका लक्ष्य भी वही है। अपनी क्षमता के अनुसार मनुष्य भक्ति करते हैं। मनुष्य जीवन में कितना समय मिलता है, साठ, सत्तर, अस्सी साल बस..।
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