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काव्य : माँ के वचन - अभिलाषा श्रीवास्तव ,गोरखपुर


काव्य : 

माँ के वचन

अग्नि के समक्ष सात फेरे लेते हुए,
क्या तुमने कभी गौर से देखा है बिटिया—
मंडप के उस कलश पर सजे आम के पत्तों को?
जो अपनी हरी-भरी शाख से टूटकर भी,
मंगल-घट पर कितनी शालीनता से खिलखिलाते हैं!
बड़ी अजीब विडंबना है न यह,
भला अपनी जड़ से टूटकर भी कोई कैसे मुस्कुरा सकता है?
पर ज़रा देखो तो अपने चारों ओर,
यहाँ त्याग और समर्पण का एक पूरा संसार बिखरा है।
यह अक्षत, यह मौली, और यह मिट्टी के कुल्हड़ में रखा दही...
ये कभी चिल्लाकर अपने अस्तित्व का विज्ञापन नहीं करते,
मगर सोचो, क्या इनके बिना कोई भी अनुष्ठान मुकम्मल हो सकता है?
इन सब के चेहरे पर एक गजब का संतोष है,
एक सादगी है, और है ढेर सारा अगाध स्नेह,
मानो ये शांत रहकर भी तुम्हारी विदाई पर चुपके से कह रहे हों—
"सुनो बिटिया!
जब मैके की चौखट लांघकर, ससुराल की पगडंडी पर पग-फेरी लो,
तो अपने भीतर के संकोच को ज़रा धीरज देना।
बिल्कुल धैर्यवान सरिता बनकर, समर्पण के भाव से आगे बढ़ती जाना।
याद रखना, इसी कंटीली और अनजानी पगडंडी पर चलकर,
सिर्फ तुम्हारी माँ, नानी या दादी ने ही नहीं,
बल्कि इस दुनिया की आधी आबादी ने तिनका-तिनका जोड़कर,
अपने लिए एक भव्य और आत्मीय आशियाना बनाया है।"
तभी माँ ने आँचल से अपनी आँख का कोर पोंछा,
और तुम्हारा हाथ थामकर धीरे से फुसफुसाई—
"देखो बिटिया! यह पवित्र अग्नि, यह अक्षत, मौली और दही,
और शाख से बिछड़े आम के ये पत्ते...
इन सबने तुम्हारे इस मंगल उत्सव को मुकम्मल बनाने के लिए,
तुम्हें आशीष देने के लिए, खुद को पूरी तरह सौंप दिया है।
संसार का नियम है बिटिया, वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता;
कभी धूप होगी, कभी छाँव होगी।
बनते-बिगड़ते इन हालातों में, कभी अपनों की सुन लेना, तो कभी धीरज से कह देना,
मगर इस दही, मौली और अक्षत की तरह...
दूध-पानी की तरह एक-दूसरे में मिलकर रहना।
याद रखना, जब तक परिवार की मुट्ठी बंधी है, साथ है,
तब तक इंसान के सारे अवगुण और कमियाँ ढक जाती हैं,
पर जहाँ यह साथ छूटा...
वहाँ महलों की राजकुमािरयों को भी अकेले ही वन के कांटे चुनने पड़ते हैं।"
माँ ने फिर तुम्हारे सिर पर हाथ रखा,
उसकी आवाज़ में ममता की एक भीगी हुई खनक थी,
उसने कहा—
"डरो मत बिटिया, नए रास्तों पर चलने की कोशिशों की उम्र कभी छोटी नहीं होती,
तुम जहाँ भी रहोगी, मेरा आशीष, मेरी दुआएँ, साये की तरह तुम्हारे साथ हैं।"

- अभिलाषा श्रीवास्तव ,गोरखपुर

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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