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लघुकथा : चुप्पी का उत्तर - डॉ रीटा अरोड़ा , करनाल



लघुकथा : 

चुप्पी का उत्तर

"मम्मी, देखो मैंने क्या बनाया है!"
राघव ने उत्साह से अपनी ड्राइंग माँ की ओर बढ़ाई।
"अभी नहीं बेटा, एक मिनट।"
निधि की नज़र मोबाइल स्क्रीन पर थी।

कुछ देर बाद-
"मम्मी, मेरी बात सुनो न..."
"हाँ-हाँ, बोलो।"
पर उँगलियाँ अब भी फोन पर चल रही थीं।

धीरे-धीरे राघव ने कहना कम कर दिया।
अब वह स्कूल की बातें भी अपने कमरे में जाकर खिलौनों से करता।

एक दिन निधि सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट कर रही थी-
"मेरे बेटे की मुस्कान ही मेरी दुनिया है।"
तभी स्कूल से फोन आया।
"मैडम, कृपया कल स्कूल आइए।"
अगले दिन क्लास टीचर ने राघव की कॉपी खोलकर दिखाई।

निबंध का विषय था- "मेरी सबसे बड़ी इच्छा"।

राघव ने लिखा था-

"काश मेरी मम्मी मुझे भी उतना ही देखतीं, जितना अपने मोबाइल को देखती हैं।"
निधि के हाथ काँप गए।
आँखें भर आईं।

घर आकर उसने देखा-

राघव चुपचाप बैठा था।
न कोई शिकायत,
न कोई जिद,
न कोई नाराज़गी।
सिर्फ़ एक लंबी चुप्पी।

उस दिन पहली बार
निधि ने मोबाइल एक तरफ रख दिया।
राघव के पास जाकर बोली-

"बेटा, कुछ कहोगे?"

राघव ने उसकी ओर देखा और मुस्करा दिया।
बच्चों की चुप्पी में
शब्द नहीं होते,
पर अक्सर वही
सबसे बड़ा उत्तर होती है।

- डॉ रीटा अरोड़ा 
सेवानिवृत्ति एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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