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किताबों की दुनिया :- आज रच्यो है बसंत निजाम घर - ले. यूसुफ़ सईद , द्वारा – लतिका जाधव, पुणे



किताबों की दुनिया :
 
आज रच्यो है बसंत निजाम घर 
-  ले. यूसुफ़ सईद

द्वारा – लतिका जाधव, पुणे

मनुष्य प्रकृति का अटूट हिस्सा है। प्राचीन काव्य के रचयिता प्रायः प्रकृति के निकट रहे थे। इसलिए उस समय में घटित घटनाओं पर आज आश्चर्य होता है। जैसे कि, अपने पीर को मनाने के लिए लिया गया अमीर ख़ुसरो का वह पीला बसंती स्त्री बेष  बसंत के उत्सव में कैसे बदल गया? और कैसे यह बसंत का उत्सव हिंदुस्तानी दरगाहों पर आजतक एक यादगार बना हैं?  अपने पीर को शोक मुक्त करने के लिए अमीर ख़ुसरो का वह बसंती वेष जो निजामुद्दीन औलिया को मुस्कुराने पर मजबूर कर गया था। 

 सूफ़ियों के इस बसंत का इतिहास और बदलते समय की चुनौतियों पर भाष्य करती सुंदर रंगीन आवरण और कलात्मक सजावट से बनी यह ले. यूसुफ़ सईद की  'आज रच्यो  है बसंत निजाम घर' किताब है। 

इस किताब से सूफी पंथ की रूहानी प्रेम धारा का परिचय होता है।  दस शीर्षकों के आलेखों से  बसंत जो इस कृषि भूमि का आनंदोत्सव है, पाठकों को परिचित होता जाता है। अक्षरों का बड़ा आकार  और दिये गए सुंदर मध्यकालीन रंगीन चित्रों से हिंदुस्तानी लोकोत्सव की जनप्रियता  गहराई से स्पष्ट होती हैं। किताब की भाषा सहज और प्रवाही है। 

‘एक बस्ती एक इतिहास’ दिल्ली की पुरानी निजामुद्दीन बस्ती का नक्शा है। पढ़ते हुए आंखों के सामने सब दृश्यमान होता जाता है। यहाँ निजामुद्दीन औलिया के साथ उस जमाने के खास लोगों की कब्रें है। इन सबके नाम और वहाँ जो वास्तुकला है, हर चीज़ का  वर्णन मिलता है।  सबसे बड़ी बात सात सौ सालों से अभी तक पानी देने वाली निजामुद्दीन बावली (कुआँ) का ज़िक्र है।  श्रद्धालुओं के लिए  यह बावली तीर्थ के समान है।जो कोई इस जगह जाना चाहता है, तो उनके लिए यह जानकारी जरूर मददगार साबित होगी।   हेरीटेज वॉक जैसा ही इस भाग का प्रस्तुतीकरण है। 

इस किताब में हल्की फुल्की तर्क - विचारों से लिखी बातें हमारे बढ़ते आपसी दायरों को भी नापती है। रंगों को धर्म से जोड़कर, भाषा को लेकर हम अपनी मिलीजुली विरासत को खो रहे है। इस बात पर खुलकर नर्म शैली में विषाद भी व्यक्त होता दिखाई देता है। 

 'ख़ुसरो और निजामुद्दीन औलिया का इश्क़ियां रंग'  पढ़ते हुए सूफीवाद और इस्लाम के आक्षेप पर विश्लेषण किया है।इस्लाम में सूफ़ी पंथ पर कुछ बहस भी है।सूफ़ीवाद में सूफी के लिए मृत्यु परमात्मा से मिलन का अंतिम चरण होता है। जो एक मिलन या परमात्मा से विवाह जो उर्स के रूप में मनाया जाता है। सूफ़ी परंपराओं में उर्स जो मूलतः अरबी भाषा का शब्द उरोस से लिया है। उर्स का अर्थ विवाह। मृत्यु परमात्मा से मिलन का दिवस। 

अमीर ख़ुसरो (1254-1324) मूलतः एक दरबारी कवि और अनेक कला गुणों के धनी थे। उनकी स्वामी निष्ठा  अपने हुक्मरानों के प्रति प्रामाणिक थी।  उनके चतुर व्यक्तित्व में अनेक विशेषताएं  थी। अमीर ख़ुसरो अपने हुक्मरानों की स्तुति में काफी अतिशयोक्तिपूर्ण लिखते रहे।वह अपने हुक्मरानों के विरोधीयों पर अप्रस्तुत सा लिखते रहे। राजाओं के दरबार में नियुक्ति और उनकी स्तुति करना यह उनके चरितार्थ का साधन ही था। लेकिन फिर भी वह अपने आप को 'हिंदुस्तानी तूती'  ही कहलाते रहे। आज उनके हुक्मरानों के नाम तो केवल  शुष्क  इतिहास के पन्नों पर लिखे है।लेकिन अमीर ख़ुसरो अपने पीर के साथ गरीबों, दुखियारों के मन में बसे हैं। कवि के रूप में विश्व की अनेक भाषाओं की किताबों में  वे दर्ज हो चुके है।

 तो इस बात से कवि के कलम से लिखे बोल, जो जन जीवन के बीच सालों तक ठहर जनप्रिय  हो जाते हैं। वह राजाओं की तलवारों से श्रेष्ठ साबित होते है। इस बात पर विश्वास हो जाता है। 


किताब बसंत पर है। लेकिन इस किताब का केंद्र बिंदु अमीर ख़ुसरो और निजामुद्दीन औलिया ही है। क्योंकि आज भी हमारी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में अमीर ख़ुसरो का लिखा ‘सकल बन फूल रही सरसों’ मौजूद है। प्रकृति का यह रूप तो ख़ुसरो के साथ आज भी  हर अंतर्मन का स्वर  हैं। जो  धर्म, भाषा की सीमाओं को तोड़कर आज भी सबको आनंदित कर रहा है। 

उर्दू और हिंदी में बसंत पर लिखी कविताओं का भी सोदाहरण संदर्भ दिया है। क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल जी ने लिखी 'मेरा रंग दे बसंती चोला' का जिक़्र यहाँ किया है। उस समय  'रंग दे बसंती'  साहस और त्याग का रंग दर्शाता था। यह पंक्ति हमारे  देश के लिए कुर्बानी देनेवाले क्रांतिकारी वीरों की हमेशा याद दिलाती है।  बसंत की  सारी  विशेषताओं को समेटे यह किताब सभी आयुवर्ग के पाठकों को  बसंत से जुड़े गीत,काव्य, चित्र, किस्से और संदर्भ स्त्रोतों की जानकारी देती है। फिल्मों में बसंत पर चित्रित अनेकों गीतों का ऊहापोह किया गया है। 

किताब हमारे हिंदुस्तानी रंगों में रंगे गए आगंतुकों की उस समय की दास्ताँ भी है। खुशियाँ बांटने वाली और खुशियों को स्वीकार करने वाली हमारी साझा संस्कृति की याद दिलाती किताब पाठकों को अवश्य पसंद आएगी ऐसा विश्वास है।

लेखक यूसुफ़ सईद की तस्वीर घर नाम की वेबसाईट भी है। जिसको पाठक यहाँ देख सकते हैं। www.tasveerghar.net

द्वारा – लतिका जाधव, पुणे (महाराष्ट्र) 
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• आज रच्यो है बसंत निजाम घर, (प्र. आ. जून 2026) 
• ले. यूसुफ़ सईद
• पृ.सं.114
• प्रकाशक - नवारुण, गाजियाबाद, 
उ. प्र., 
संपर्क मो.  9811577426
मूल्य – हार्ड कॉपी – 500/- 
पेपर बैक – 250
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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

1 Comments

  1. संपादक,
    श्री. देवेंद्र भाई सोनी जी,

    मेरी लिखी पुस्तक समीक्षा प्रकाशित करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद! 🙏

    लतिका जाधव, पुणे

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