काव्य :
!! गीतिका!!
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पिछले कई दिनों से वे लोग खल रहे हैं।
जो स्वार्थ हेतु जुड़कर अपनों को' छल रहे हैं।
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सच्चे डरे हुए हैं झूठों का' बोलबाला,
गिरगिट समान छलिये नौ-रँग बदल रहे हैं।
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बिन पात्रता मिले पद मिलती यहाँ तरक्की,
जो योग्य हैं, सड़क पर बेबस टहल रहे हैं।
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धन और बाहुबल का लेकर सदा सहारा,
नेता सफल हुए हैं, सब हाथ मल रहे हैं।
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अपराध बढ़ रहे हैं, है अति लचर व्यवस्था,
करके गुनाह मुलजिम बचकर निकल रहेे हैं।
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ईमान मर गया है विश्वास खो गया है,
निर्मल नजर नहीं है दुर्भाव पल रहे हैं।
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सन्मार्ग पर चलें क्यों?सच से न कुछ मिलेगा,
यह सोच सतपथी से 'रवि' लोग जल रहे हैं।।
- रामकिशोर श्रीवास्तव 'रवि',भोपाल(म•प्र•)
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