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सड़क पर पैदल सुरक्षा , मौलिक अधिकार - सुप्रीम कोर्ट ने कहा - डॉ घनश्याम बटवाल मंदसौर



सड़क पर पैदल सुरक्षा - मौलिक अधिकार - सुप्रीम कोर्ट ने कहा

एक मासूम की मौत, सुप्रीम कोर्ट का चाबुक और फुटपाथों की जंग

वरिष्ठ पत्रकार डॉ घनश्याम बटवाल मंदसौर

    जब विकास की दौड़ में हम सड़कों की चौड़ाई नापते हैं लेकिन पैदल चलने वालों की सांसों को भूल जाते हैं, तब न्यायपालिका को सबसे सख्त रूप में सामने आना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट का हालिया ऐतिहासिक फैसला — कि सीमांकित फुटपाथ पर सुरक्षित चलना नागरिकों का मौलिक अधिकार है — सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि हमारे शहरी विकास मॉडल पर एक तीखा सवाल है। 
नगरीय विकास की अवधारणा में इस बिंदु को जोड़कर योजना बनाने की नितांत आवश्यकता है ।
सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला उस पांच वर्षीय बच्चे की चीख है, जो पिता का हाथ थामे स्कूल जा रहा था और एक बेकाबू ट्रक की भेंट चढ़ गया। यह उस लाखों पैदल यात्रियों की आवाज है जो हर दिन अपनी जान की बाजी लगाते हुए सड़कों पर निकलते हैं क्योंकि उनके हिस्से की जगह पर ट्रांसफॉर्मर, दुकानें, धार्मिक स्थल या वीआईपी गाड़ियां कब्जा जमाए बैठी हैं। फुटपाथ पर अतिक्रमण की बाढ़ आई हुई है । अनियोजित रूप से फैले स्थाई अस्थाई अतिक्रमण से प्रतिदिन पैदल चलना दूभर हो गया है । ओर यह हर नगर और शहरों की स्थिति है ।

 *आंकड़ों की ज़ुबानी - मौत की कहानी*

2023 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में सड़क दुर्घटनाओं में 35,000 से अधिक पैदल यात्री अपनी जान गंवा चुके थे। 
कुल सड़क मृत्यु में पैदल यात्रियों की हिस्सेदारी बेहद चिंताजनक है। हर साल औसतन 1.7 लाख से ज्यादा लोग सड़क हादसों में मारे जाते हैं — यानी रोजाना 470 से अधिक मौतें । ये तो मौत के आंकड़े हैं पर दुर्घटनाओं में अंग भंग, स्थाई शारीरिक क्षति , घायलों की संख्या कहीं अधिक है ।
हमारे शहरों का विकास मॉडल पैदल चलने वालों, साइकिल सवारों और दिव्यांगों को “दूसरी श्रेणी” का नागरिक मानता है। फ्लाईओवर बनते हैं, एक्सप्रेसवे चौड़े होते हैं, लेकिन फुटपाथ या तो गायब हैं या अतिक्रमण से जकड़े हुए। मोटर वाहन अधिनियम ( MVA) की धारा 201 में सख्त प्रावधान हैं, फिर भी जमीनी हकीकत नहीं बदलती।

*दुनिया हमें क्या सिखा रही है?*

वैश्विक स्तर पर पैदल यात्री-अनुकूल शहर न सिर्फ सुरक्षित हैं, बल्कि अधिक जीवंत, स्वस्थ और सस्टेनेबल भी हैं। देखिये कुछ शहरों की व्यवस्था  - 
*नीदरलैंड* (खासकर एम्स्टर्डम और अन्य शहर): यहां “वोनरफ़” (Living Street) का सिद्धांत लागू है। पैदल यात्री और साइकिल सवारों को सर्वोच्च प्राथमिकता। गाड़ियां मेहमान की तरह धीमी गति से चलती हैं। नतीजा — कम प्रदूषण, बेहतर स्वास्थ्य और मजबूत सामुदायिक भावना।

*सिंगापुर*: ‘वॉक-साइकिल-राइड’ नीति के तहत हर फुटपाथ को छायादार शेल्टर से ढका गया है। अतिक्रमण पर लाखों का जुर्माना और जेल। नतीजा — गर्म-नम जलवायु के बावजूद लोग पैदल चलना पसंद करते हैं।

*पेरिस:* मेयर एन्न हिडाल्गो के नेतृत्व में शहर को “15-मिनट सिटी” में बदल दिया गया। कारों के रास्ते बंद कर पैदल यात्रियों को सौंपे जा रहे हैं। 2002 से 2023 तक कार ट्रैफिक आधे से भी कम हो गया, जबकि साइकिल और पैदल यातायात बढ़ा।

ये वैश्विक शहर साबित करते हैं कि पैदल चलने की संस्कृति कोई “पुरानी” चीज नहीं, बल्कि आधुनिक, स्मार्ट और मानवीय शहरीकरण का आधार है।

*ऐसे में अब हम क्या करें? —* 

सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक शुरुआत है, लेकिन असली बदलाव तभी आएगा जब हम इसे बहु-आयामी आंदोलन बनाएं:
*राष्ट्रीय स्तर पर पैदल सुरक्षा नीति*: केंद्र सरकार को पूरे देश के लिए एक समान SOP और गाइडलाइंस बनानी चाहिए। हर नए रोड प्रोजेक्ट में फुटपाथ, क्रॉसिंग, दिव्यांग-अनुकूल सुविधाएं अनिवार्य हों। साथ ही ट्रैफिक सिग्नल्स है तो उन्हें सिस्टम अनुसार चालू रखा जाय ।

*शहर-स्तरीय सुरक्षा ऑडिट:* 
हर महानगर और शहर में 6 महीने के अंदर फुटपाथों का पूरा मैपिंग और ऑडिट। अतिक्रमण हटाने के बाद उन्हें “नो-टॉलरेंस जोन” घोषित करें। जरूरी और दैनिक फेरीवाले, को उपयुक्त स्थान दें और बदलने पर वैकल्पिक जगह मिले ताकि रोज़गार प्रभावित ना हो ।

*जवाबदेही का सिस्टम:* 
दोबारा अतिक्रमण होने पर सीधे स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी (वार्ड काउंसलर, इंजीनियर, यातायात पुलिस नगर निगम नगर पालिका नगर परिषद ) पर कार्रवाई। दैनंदिन जिम्मेदारी है अगर कोई अतिक्रमण करे तो तत्काल प्रभाव से कार्यवाही करें।

*प्रदर्शन सूचकांक* (Performance Index) में पैदल सुरक्षा को वेटेज दें। इंडिकेशन प्रदर्शित हो ओर उनका पालन भी सुनिश्चित करें ।

*शहरी और नगरीय डिजाइन में बदलाव*: 
नई बिल्डिंग्स में फुटपाथ से जुड़े एक्टिव फ्रंटेज अनिवार्य। स्कूलों, अस्पतालों और मेट्रो स्टेशनों के आसपास “स्कूल स्ट्रीट्स” और पेडेस्ट्रियन जोन बनाएं।

*सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव:*
 स्कूलों में पैदल चलने की आदत को बढ़ावा दें। कंपनियां “वॉक टू वर्क” डे मनाएं। नागरिक खुद फुटपाथ पर गाड़ी पार्क नहीं करें।
हम सबकी जिम्मेदारी
“कोई भी शहर तब तक महान नहीं बन सकता जब तक उसके फुटपाथ सुरक्षित और सम्मानजनक न हों। सभ्यता की असली परीक्षा अमीर की कार की स्पीड नहीं, बल्कि आम आदमी की सहजता और गरिमा है।”
यह लड़ाई केवल अदालतों और प्रशासन की नहीं है। यह हमारी — आपकी और मेरी — भी है। जब तक हम अपनी दुकानों को फुटपाथ पर न बढ़ाएं, गाड़ी फुटपाथ पर न पार्क करें, और अपने बच्चों को पैदल चलने की आदत न डालें, तब तक बदलाव अधूरा रहेगा।
आदर्श मार्ग मॉडल रोड़ निर्माण कार्य हर क्षेत्र में करने हेतु प्रचलन में है मंदसौर नीमच रतलाम उज्जैन इंदौर अछूता नहीं है पर संबंधित विभागों में समन्वय होना अनिवार्य है अन्यथा विपरीत परिणाम सामने आए हैं और पैदल चलना जानलेवा होता जा रहा है । 
सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फैसला हमारे शहरों और नगरीय क्षेत्रों के पुनर्जन्म का सुनहरा अवसर है। 
तो आइए इसे सिर्फ खबर न बनने दें, बल्कि एक जन-आंदोलन बनाएं। फुटपाथों को आजाद कराइए — क्योंकि सुरक्षित फुटपाथ ही सुरक्षित, स्वस्थ, समावेशी और सभ्य भारत की पहली सीढ़ी है।

तो चलो, कदम बढ़ाते हैं।
अपने शहर को पैदल चलने लायक बनाते हैं। क्योंकि सच्चा विकास वह है जो इंसान को केंद्र में रखता है।
सड़कों पर बने फुटपाथ पर चलना मौलिक अधिकार के साथ मानव अधिकार भी है परस्पर समझ सहयोग और समन्वय से समाधान किया जा सकता है , बस धैर्य और संतोष को जोड़कर अभियान बनाएं 
स्वयं सेवी संगठनों सामाजिक संगठनों की संयुक्त भूमिका हितकारी हो सकती है बस प्राथमिकता में लेने की जरूरत है । वरना सर्वोच्च न्यायालय ने तो आमजन नागरिकों के हित में निर्णय दिया है पर लागू करने की जिम्मेदारी प्रशासन पुलिस ओर जनप्रतिनिधियों की अहम है।
यातायात सप्ताह मनाना एक बात है पर पैदल नागरिकों सुगमता से गंतव्य तक पहुंच जाय और भी महत्वपूर्ण है ।
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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