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काव्य : मेरे पापा मिले क्या? - डॉ. सत्येंद्र सिंह, पुणे, महाराष्ट्र



काव्य : 

मेरे पापा मिले क्या?

मेरे पापा मिले क्या?
एक बेटी के ये शब्द
सबको आहत करते रहे ,
और आहत मन से ही
बचाव कार्य में जुटे
पुलिस कर्मी
एनडीआरएफ जवान
नम आंखों से
बचाव कार्य में लगे रहे।
मेरा भाई मिला
मेरे पति मिले
प्रश्नों के अंबार लगे
उत्तर किसी के न मिले।
परिजनों की भीगी आंखें
गिरे हुए कचरे के पहाड़ को
ताकती हैं
निरखती परखती हैं।

पूरे शहर के निवासी
कितना कचरा उत्पन्न करते हैं
कि उसका पहाड़ बन जाए,
और जब गिरे तो
तीन मंजिला भवन को ढहा जाए।
कचरे के ढेर में दबे लोगों के
प्राण कैसे, कितने तड़पे होंगे
शरीर से कैसे निकले होंगे
क्या कचरे से बाहर आये होंगे
या कचरे में विचरण करते होंगे।

कौन जाने ?
जिस कचरे में रह नहीं सकते
उसमें दबने पर क्या
तकलीफ़ हुई होगी
कौन जाने?
मोशी पिंपरी चिंचवड़ पुणे
इसके साक्षी हैं।
और परिजनों की नम  आँखें
व सिसकियाँ
साक्षी हैं।
पर बेटी का प्रश्न गूंजता रहेगा
मेरे पापा मिले क्या?

प्रश्न तो अंतस् में यह भी उठता है
कि इतना कचरा
क्यों और कहाँ से आता है
पहले भी लोग रहते थे
पर इतना कचरा नहीं होता था।
घर से कचरा बहुत कम निकले
यह सोचना होगा
बेटी के प्रश्न का उत्तर
देना होगा
और सबको मिलकर
देना होगा।
नहीं तो हर कान में गूँजता रहेगा
मेरे पापा मिले क्या?
                                
 - डॉ. सत्येंद्र सिंह
   पुणे, महाराष्ट्र
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

2 Comments

  1. सत्येंद्र सिंह जी, भयभीत मन का आक्रंदन इस रचना से अभिव्यक्त हुआ है। यह बढ़ती वैश्विक रंगीनियों का कुप्रभाव है। इस लिए किसी को माफ़ नहीं कर सकते है। बेटी तो पापा के दिल का टुकड़ा होती हैं। उसकी आहत करती पुकार रचना से प्रतिध्वनित हुई है।
    बहुत मार्मिक और समाज का गिरता जीवन स्तर चित्रित किया है।
    साधुवाद🙏

    लतिका, पुणे

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  2. बहुतही संवेदनशील. . समाज के हर नागरिक कि जिम्मेदारी है कि कचरा कम तैयार करे. दिलीप

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