काव्य :
तू ही तू
मन मंदिर में
जलाकर दीपक तेरे
नाम का
दर को तेरे खुदा की
चौखट मान लिया
प्राणों की अगरु कर प्रज्वलित
साँसों के मनके गिन
तेरा नाम लिया।
रोम-रोम में तू
बसता है
रक्तिम रग मैं तू
बहता है
धड़कन की हर ताल
पे मेरी
रूह का अनथक रक्श
चलता है
जित देखूँ नयनन उठा
हर सूँ मुझको तू ही
तू दिखता है।
हर रात तेरी यादों की
चादर ओढ़ी है
दिन तेरे कदमों की राह
चला है
नयनकोर में छब तेरी लिये
सपनों का मैंने संसार
रचा है
भावों के हर उद्वेग में
तेरा ही नशा रचा-
बसा है।
- डा.नीलम , अजमेर
Tags:
काव्य
.jpg)