काव्य :
जिंदगी
जैसे तैसे कटी जिन्दगी,
कई हिस्सों में बटी जिन्दगी ।
जैसे हो कपड़े गरीब के,
जगह जगह से फटी जिन्दगी ।
जैसे जैसे बढ़ी उमर तो,
वैसे वैसे घटी जिन्दगी ।
आसमान तक उड़ना चाहा,
पर पतंग सी कटी जिन्दगी ।
कभी सदर तो कभी ठोकरें ,
ऐसी थी अटपटी जिन्दगी ।
--डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्तव
विशु नगर, परासिया मार्ग,
छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश)
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काव्य
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