आलेख :
सिर्फ़ अच्छा इंसान नहीं, सही जीवनसाथी चुनिए
विवाह केवल दो लोगों का साथ नहीं, बल्कि दो विचारों, दो जीवन-मूल्यों और दो जीवन-दृष्टियों का मिलन है।
"दादी, दादाजी आपको देखकर ही 'हाँ' बोले थे?" पोती ने मुस्कुराते हुए पूछा।
दादी भी मुस्कुरा दीं, "नहीं बेटा, उन्होंने सबसे पहले मेरे पिताजी से एक ही बात कही थी—'मुझे ऐसी पत्नी चाहिए, जो हर परिस्थिति में मेरे साथ चल सके।'"
"और आपने?"
"मैंने भी यही सोचा था कि मुझे ऐसा पति मिले, जो मुझे बदलने की नहीं, समझने की कोशिश करे।"
पोती कुछ देर चुप रही।
दादी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "बेटा, जीवनसाथी वह मत चुनना जिसके साथ शादी अच्छी लगे... जीवनसाथी वह चुनना जिसके साथ पूरी ज़िंदगी अच्छी लगे।"
यही बात शायद आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई है।
जब भी किसी लड़की या लड़के के विवाह की बात चलती है, सबसे पहला वाक्य अक्सर यही सुनने को मिलता है -"लड़का बहुत अच्छा है।" या "लड़की बहुत संस्कारी है।" मानो जीवनसाथी चुनने का सबसे बड़ा पैमाना केवल "अच्छा इंसान" होना ही हो।
निस्संदेह, अच्छा इंसान होना बहुत आवश्यक है, लेकिन क्या केवल यही पर्याप्त है?
इस प्रश्न का उत्तर अक्सर शादी के कुछ वर्षों बाद मिलता है, जब दो अच्छे लोग यह महसूस करने लगते हैं कि वे एक-दूसरे के साथ खुश नहीं हैं। तब समझ आता है कि विवाह केवल अच्छाई से नहीं, अनुकूलता (Compatibility) से भी चलता है।
एक बार एक परिचित अपनी बेटी के रिश्ते की बात कर रहे थे। उन्होंने बड़े गर्व से कहा, "लड़का बहुत ईमानदार है, परिवार भी अच्छा है।"
मैंने सहज ही पूछा, "क्या दोनों ने जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर खुलकर बात की है?"
उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "उसकी क्या ज़रूरत है? शादी के बाद सब अपने-आप समझ जाते हैं।"
मैंने कहा, "शादी के बाद समझना अच्छा है, लेकिन शादी से पहले समझ लेना उससे भी ज़्यादा अच्छा है।"
यहीं हम अक्सर सबसे बड़ी भूल कर बैठते हैं।
विवाह कोई ऐसा रिश्ता नहीं है जिसे केवल भावनाओं के भरोसे निभाया जा सके। यह जीवनभर की साझेदारी है। यहाँ हर दिन छोटे-बड़े निर्णय लेने होते हैं- करियर, परिवार, आर्थिक प्राथमिकताएँ, बच्चों का पालन-पोषण, बुज़ुर्गों की ज़िम्मेदारियाँ, जीवनशैली और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे अनेक विषय सामने आते हैं।
यदि इन बातों पर सोच बिल्कुल अलग हो, तो प्रेम भी धीरे-धीरे संघर्ष में बदल सकता है।
मैंने ऐसे अनेक दंपतियों को देखा है जहाँ दोनों अपने-अपने स्थान पर अच्छे इंसान हैं। पति ईमानदार है, पत्नी संवेदनशील है। दोनों अपने परिवार का सम्मान करते हैं। फिर भी घर में शांति नहीं है।
कारण यह नहीं कि कोई गलत है।
कारण केवल इतना है कि दोनों की अपेक्षाएँ और जीवन को देखने का दृष्टिकोण अलग है।
एक व्यक्ति सादा जीवन पसंद करता है, दूसरा घूमना-फिरना चाहता है। एक संयुक्त परिवार में रहना चाहता है, दूसरा स्वतंत्र जीवन। एक बचत को प्राथमिकता देता है, दूसरा वर्तमान को खुलकर जीना चाहता है। कोई करियर को महत्व देता है, तो कोई परिवार को।
इनमें से कोई भी सोच गलत नहीं है। लेकिन यदि विवाह से पहले इन विषयों पर खुलकर बातचीत ही न हुई हो, तो बाद में यही मतभेद रिश्ते की नींव को कमजोर करने लगते हैं।
कई माता-पिता केवल सामाजिक प्रतिष्ठा, नौकरी, वेतन, घर और परिवार देखकर निर्णय ले लेते हैं। वहीं कई युवा केवल आकर्षण, रूप या भावनाओं के आधार पर जीवनसाथी चुन लेते हैं। दोनों ही स्थितियों में एक महत्वपूर्ण प्रश्न पीछे छूट जाता है-
*"क्या हम दोनों जीवन को एक जैसी दृष्टि से देखते हैं?"*
विवाह में समानता का अर्थ यह नहीं कि दोनों बिल्कुल एक जैसे हों। दो व्यक्तियों का अलग होना स्वाभाविक है। लेकिन उनके मूल जीवन-मूल्य, एक-दूसरे के प्रति सम्मान और संवाद की क्षमता में संतुलन होना चाहिए। आखिर रिश्तों में समानता का अर्थ समान सोच नहीं, बल्कि समान सम्मान होता है।
*जहाँ रिश्तों में समानता और पारस्परिक सम्मान नहीं होता, वहाँ प्रेम धीरे-धीरे अपना सौंदर्य खो देता है। फिर वह प्रेम नहीं, कभी एहसान तो कभी बोझ बनकर रह जाता है।*
यही कारण है कि सफल विवाह केवल प्रेम पर नहीं, बल्कि सम्मान, विश्वास, संवाद और एक-दूसरे को बराबरी से स्वीकार करने की भावना पर टिके रहते हैं।
जीवनसाथी चुनते समय कुछ प्रश्न स्वयं से अवश्य पूछिए-
* क्या हम एक-दूसरे की बात सुन सकते हैं?
* क्या मतभेद होने पर भी सम्मान बना रहेगा?
* क्या हम एक-दूसरे के सपनों का सम्मान करेंगे?
* क्या कठिन समय में हम एक-दूसरे का संबल बनेंगे?
* क्या हम दोनों साथ रहते हुए भी अपनी-अपनी पहचान बनाए रख पाएँगे?
इन प्रश्नों के उत्तर किसी कुंडली, वेतन, डिग्री या तस्वीर में नहीं मिलेंगे। इनके उत्तर केवल ईमानदार संवाद, परस्पर समझ और एक-दूसरे के व्यक्तित्व को जानने से मिलेंगे।
आजकल विवाह की तैयारियों पर महीनों समय और लाखों रुपये खर्च कर दिए जाते हैं। समारोह की हर छोटी-बड़ी बात पर ध्यान दिया जाता है, लेकिन जिस रिश्ते को जीवनभर निभाना है, उस पर खुलकर बातचीत करने के लिए कुछ घंटे भी नहीं निकाले जाते।
शायद यही कारण है कि भव्य शादियाँ भी कभी-कभी साधारण रिश्तों में बदल जाती हैं।
जीवनसाथी वह नहीं जो केवल आपकी खुशियों में मुस्कुराए। सच्चा जीवनसाथी वह है जो आपकी असफलताओं में आपका आत्मविश्वास बनाए रखे, आपकी सफलताओं से ईर्ष्या नहीं बल्कि प्रसन्नता महसूस करे, आपके विचारों का सम्मान करे और आवश्यकता पड़ने पर आपकी कमियों की ओर भी प्रेमपूर्वक ध्यान दिला सके।
आख़िरकार, विवाह एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि जीवनभर की साझेदारी है।
इसलिए निर्णय लेते समय केवल यह मत देखिए कि सामने वाला कितना अच्छा इंसान है।
यह भी देखिए कि क्या वह आपके व्यक्तित्व, आपके मूल्यों, आपके सपनों और आपके जीवन की दिशा के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सकता है।
क्योंकि विवाह में अच्छा इंसान मिलना सौभाग्य की बात है, लेकिन सही जीवनसाथी मिलना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
--डॉ. रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
करनाल
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