व्यंग्य :
गैस की समस्या
अरे मिश्रा जी, नमस्कार। कहाँ जा रहे हैं ?
बड़े परेशान दिखाई दे रहे हैं। क्या कोई गंभीर विषय है?
हाँ दुबे जी। बहुत परेशान हैं। समस्या विकट है। कोई हल नहीं सूझ रहा है।
तभी वहाँ से गुजरते हुए वर्मा जी भी दोनों को देख कर रुक गये। भाई क्या बात है? बड़े गहन चिंतन में डूबे हैं।
सब ठीक है ना?
फिर दुबे जी ने आचार्य जी को भी बुला लिया। भैया, मिश्रा जी पर कुछ आपदा आन पड़ी है। सबसे ज्यादा पढ़े लिखे तो आप ही हो। आपके पास तो हर समस्या का हल होता है। हमारा मित्र मुसीबत में है। हमें उसकी मदद करना चाहिए।
हाँ हाँ क्यों नहीं? पड़ोसी धर्म तो निभाना ही पड़ेगा। मैं अभी आता हूँ।
आचार्य जी ने पहुँचते ही अपनी सारी संवेदनाएं उंडेलते हुए पूछा -बताइए मिश्रा जी क्या समस्या है?
भैया, गैस की समस्या है। मिश्रा जी ने कहा।
अरे बाप रे। यह तो बड़ी जटिल समस्या है । गैस बहुत परेशान करती है । कभी सीने पर चढ़ जाये तो हार्ट अटैक के दर्द से भी ज्यादा दर्द होता है।पिछले दिनों हमारे एक दूर के रिश्तेदार तो इसी के चलते परलोक सिधार गये।
मैं तो रोज रात को त्रिफला चूर्ण लेता हूँ। कभी गैस की परेशानी नहीं होती। आप क्यों नहीं लेते? वर्मा जी अपना नुस्खा आगे बढ़ाते हुए बोले।
मैं तो कहता हूँ तुरन्त डाक्टर को दिखा देते हैं। मैं अपने बेटे से कहता हूँ, कार ले कर आ जायेगा। कहते हुए दुबे जी अपने बेटे को फोन लगाने लगे।
तब तक वर्मा जी दौड़े और घर से किसी बाबाजी का दिया चूर्ण और गिलास भर गुनगुना पानी ले आये। बोले- ये चूर्ण ले लो, दर्द से कुछ तो राहत मिलेगी।
अरे सुनिए तो सही। मिश्राजी अत्यन्त धीमी आवाज में बोले, जिसे सबने अनसुना कर दिया।
नहीं- नहीं।अब कहना सुनना सब बाद में। पहले डाक्टर को दिखाते हैं।
मैं तो कहता हूँ कि पीछे वाली गली में वैद्य जी का आयुर्वेदिक दवाखाना है। वहीं चलते हैं।आचार्य जी बोले।
तभी वर्मा जी का बेटा कार लेकर आ गया।
मिश्रा जी को पकड़कर जबरदस्ती कार में बैठा दिया गया।
मेरी बात तो कोई सुन ही नहीं रहा।मिश्रा जीबोले।
सब ठीक हो जायेगा भाई जी। घबराइये नहीं।
अरे आप सुन क्यों नहीं रहे मेरी ?
अच्छा कहिए। क्या कहना चाहते हैं ?
भैया, गैस की समस्या है, मतलब रसोई गैस की समस्या है । घर में गैस खत्म हो गई। दो दिन हो गये, सिलेंडर नहीं आया। आप लोग बात को कहाँ से कहाँ ले गये।
सब एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।
तो ऐसा पहले बताना चाहिए था। हम यूंही परेशान हो गये। सब एक सुर में बोले।
(सभी खिसियानी हँसी हँसते हुए अपने अपने घरों को चल दिए। तभी गैस सिलेंडर डिलीवरी वाली गाड़ी घर के सामने आकर खड़ी हो गई।)
- मनमोहन चौरे भोपाल
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