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संस्मरण : कुछ तो है - डॉ गिरिजेश सक्सेना,भोपाल


कुछ तो है 

(एक विचार विवेचक संस्मरण)

      मैं नास्तिक तो नहीं, घनघोर अंधविश्वासी, आध्यात्मिक. आस्तिक भी नहीं, पर तो भी धर्म को मानता हूँ, तार्किक सत्यता और तथ्यों के आधार पर| जब भी कोई धर्म, आस्था, रीति-रिवाज़, धर्मग्रन्थ,पुराण की चर्चा होती है तो मैं यह मानता हूँ की हमारे पुरातन-पुरुष आज के लिखित भोंपू विज्ञान से बहुत परे नहीं होते पर होता यह है की हम उस सब को बिना सोचे समझे, यथावत मानना,मनाना जारी रखते है| मैं इस सब से परे, इस सब को यूँ ही नहीं मान लेता हूँ, पर एक खोजी के रूप में, तार्किक के रूप से जानने समझने का प्रयास करता हूँ कि ऐसा क्यूँ?
अपने संस्मरणों की श्रृंखला में “विचित्र किन्तु सत्य” में मैंने बताया था कि कैसे एक अनजान भविष्यवक्ता द्वारा नगालेंड में भोपाल से कोई २५०० किमी दूर मेरे घर पर की गयी तांत्रिक क्रिया से अवगत करा कर संभावित अहित से सचेत,अवगत कराया था| मैं उनके द्वारा चेताये जाने पर छुट्टी ले कर घर आया था और उस हितरक्षक के वक्तव्य को शत-प्रतिशत सत्य पाया|
एक और घटना थी 2002 में, मेरे एक अत्यंत निकट संबंधी (साले के साले) से सम्बंधित| वे भोपाल से कोई २५० किमी दमोह में पोस्टेड थे, मेरी वैवाहिक वर्षगाँठ उत्सव में शामिल होने भोपाल आ रहे थे| ट्रेन से आना उनका पूर्व निर्धारित था परन्तु किसी कारणवश उनने कार से आने का तय किया| अभिन्न मित्र प्रदोष का फोन आया तो उन्हें बताया कि कल सुबह मैं भोपाल के लिए निकल रहा हूँ कार से| प्रदोष तंत्र-मन्त्र सिद्ध थे, प्रखर भविष्य वक्ता थे| प्रदोष ने कहा-“ट्रेन से  आओ|”
“अब यार मैं तो निकल चुका हूँ, रास्ते मैं हूँ”- प्रभात ने कहा|”
प्रदोष नाराज़ हो गया-“तुझे पहले भी कहा है,तेरे योग अच्छे नहीं चल रहे है, तीव्र मारकेश हैं|
प्रभात ने मुद्दे को हंसी में उड़ा दिया-“ यार तू तो वहमी है, कभी तो बक्श दे|”
ठीक है तू तो जिद्दी है किसी की सुनता नहीं, अकेला आ रहा है?”
नहीं कमलेश भी सपरिवार साथ में है इसी लिए कार से आ रहा हूँ|
तू अपने साथ उन्हें भी मरवाएगा, चल मैं ही कुछ करता हूँ”- प्रदोष ने कहा|
अबे चुप मनहूस! तू, तू क्या कर लेगा, चल ओ.के”- और प्रभात ने फोन बंद कर दिया| 
यह चर्चा 31 अगस्त 2002 सुबह छः बजे के आस-पास की है|उस दिन हमारी शादी   की तीसवीं वर्षगांठ थी| उस समय दिन चढ़ चुका था, करीब बारह बजे मैं मेस से लौट कर आया, सारी तैयारियों का जायज़ा ले कर| अब टेलेफोन युद्ध की तैयारी थी, लोगों को शाम की पार्टी(रात्रि-भोज) की याद दिलाना था| बड़ा आयोजन था, इधर शादी वर्षगाँठ की बधाइयों का भी ताँता लगा हुआ था| बधाइयों और निमंत्रण के फोन काल्स के बीच ही अजय का फोन आया-“ जीजा जी आज शाम की पार्टी में मैं नहीं आ पाऊंगा”और उसने अपने साले प्रभात की दुर्घटना में दिवंगत होने की बात बताई|
स्थिति एकदम १८० उलट हो गयी थी | एक दम ही सगे निकट संबंधी के साथ ऐसी अनहोनी होने से मेरा मन उखड गया था| जहां अभी मैं लोगों को आमंत्रण दे रहा था, अब पार्टी का रद्द करने का खेद व्यक्त कर रहा था|
एक ह्रदय विदारक दृश्य था जब मैं वहां गया| वहीं मेरी उन मित्र प्रदोष से मुलाकात हुई| वे बहुत दुखी थे,बारबार कह रहे थे, मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं हुयी आम तौर पर ऐसा होता नहीं| मैंने पूछा-“क्या हुआ तो उनने बताया-“मेरे मना करने के बाद भी जब यह नहीं माना  स्नान शुद्धि कर इसकी रक्षा के लिये रक्षा स्त्रोत्र, महामृत्युंजय जाप के लिए बैठ गया| शायद मुझे दो घंटे बीत गए थे कि एकाएक मेरे हाथ से माला छूट गयी, अखंड ज्योति की बाती बुझ चुकी थी,धुंआ उठ रहा था| मैं हतआहूत किंकर्तव्य था की फोन की घंटी बजी और अशुभ समाचार मिला | मैं क्षोभ अविश्वास से घिरा यहाँ के लिए रवाना हो गया|
तार्किक रूप से मुझे घटना का यह स्वरुप स्वीकार्य नहीं था अतः मैनें मन से इसे मात्र संयोग  मान कर मन समझा लिया|
ऐसा ही कुछ घटनाक्रम २०२३ में अपने स्वयं के साथ हुआ| नए वर्ष, दिसम्बर की २५ से ३१ दिसम्बर छुट्टियों में हम अक्सर बच्चों के पास ही चले जाते थे| इस वर्ष हमने उपासना के पास जाने का सोचा| उपासना ने मगर कहा-“पापा मैं अभी अभी तो दुबई से कांफ्रेंस से लौटी हूँ और अभी सद्गुरुआश्रम मेडिटेशन सेशन के लिए जाना है| २८-२९ तक लौटूंगी समय ही कहाँ बचेगा इस लिए आप अभी का प्रोग्राम मत बनाइये, वहां से आकर मैं ही भोपाल आ जाउंगी| मैंने श्रीमतीजी के लिए थोडा चेंज हो जाएगा सोचकर  २६ दिसम्बर को उन्हें उनकी बहन चित्रा के पास इंदौर भेज दिया| 
२७-२८ की रात मैं सो नहीं पाया एक अकथ्य बेचैनी सी रही, २८ सुबह उठ कर मैंने इनको बताया| इनने भी वैसी ही बैचेनी होना बताया| मन अशांत था तो मैंने इनको कहा कि वापस आओ उपासना के पास मुंबई जाना है| दुसरे ही दिन ये वापस लौट आयीं, मैंने ३१ दिसम्बर का रिसर्वेशन कराया और मुंबई के लिए निकल गए| कुछ वैसी ही बैचेनी मुंबई में आरती को भी हुयी तो वह भी , हालांकि उसके सास ससुर युएस से उसी दिन आये थे, ३१ की सुबह उपासना के पास पहुँच गयी थी|
मुम्बई में गपशप चल रही थी तभी फन लविंग़ मूड में उपासना ने ज़िक्र किया-“ मम्मी कल पोटली मसाज वाली आयी थी| मसाज के लिए उसने जैसे ही पोटली बाँधी वह फट गयी| उसने दूसरी बाँधी वह भी फट गयी| उसने फिर तीसरी बाँधी वह भी फट गयी तो वह घबरा गयी- “दीदी ऐसा कभी नहीं हुआ मेरे साथ| दीदी आप कुछ करो, किसी ने कुछ किया है आप पर|” मैंने उसे हंस कर टालना चाहा तो उसने फिर से जोर दे कर कहा-“दीदी मजाक मत समझो कुछ सीरियस हो जाएगा” और वह बिना मसाज किये सामान समेट कर चली गयी| पूरी घटना को लेकर मैं और उपासना ( दोनो ही विज्ञान के छात्र ,डाक्टर) उस घटना का मज़ाक बना कर हंसने लगे-“ऐसा भी कुछ होता है ?”
एक कुसंयोग उसी शाम उपासना की तबियत कुछ गड़बड़ हुयी,उसे उपलब्ध डाक्टर के पास ले गए, कुछ आराम नहीं हुआ तो इमरजेंसी में पास के अस्पताल में भरती कराया| एक जनवरी से तीन जनवरी तक उस अस्पताल में इलाज चला, चार जनवरी को एकाएक स्थिति गंभीर हो गयी| हायर सेंटर हॉस्पिटल में शिफ्ट किया पर पांच जनवरी की शाम उसने इस असार संसार से हमें विदा कह दिया|
एक दूर-निदान पद्धति (डिस्टेंस हीलिंग) मैंने सुन राखी थी “रेकी” शायद जापानी है| २००२ की ऊपर लिखी घटना में वर्णित प्रभात की पत्नी दिव्या इस “रेकी” टेली हीलिंग  की सिद्ध हस्त “रेकी-मास्टर” है| आरती (दूसरी बेटी) की घनिष्ठ मित्र व्यावसायिक रेकी की ”रेकी मास्टर” है| आरती ने उन्हें संपर्क किया तथा हीलिंग प्रेयर करने का बोला| इन दो के अतिरिक्त उपासना के गुडविल के कारण दो अन्य रेकी मास्टर्स भी इसी साधना में लगे थे| सभी का उद्देश्य था उपासना की प्राण रक्षा|
तर्कों की दुनिया के पार, फिर एक संयोग़, चारों ही थेरापिस्ट का एक ही कहना था, (दो पांच मिनिट के अंतर से) कि शाम पांच बजे तक “उपासना” थेरेपी सिग्नल्स स्वीकार कर रही थी, ठीक पांच बजे उसने सभी सिनल्स स्वीकार करना बंद कर दिया, हम हार गए| 
ऐसा क्या है जो सैकड़ों किमी की दूरी के बावुजूद प्रदोष का प्रभात के लिए संकट आभास, २७-२८ की रात मेरा और श्रीमति जी का एक साथ मन अशांत होना, आरती का मन अशांत होना| तीन तीन बार पोटली फटना| हजारों किमी की दूरी पर भी तरंगों का न केवल विद्दमान होना अपितु एक निश्चित समय तक “संवाद” होना| तीन चार लोगों का हजारों मील दूर बैठे लोगों के एक ही समय पर एक ही प्रकार की तरंगे महसूस करना, एक ही समय पर तरंग स्वीकारोक्ति समाप्त होना विचारणीय तो है|
दोनों ही घटनाओं में मेरी वैज्ञानिक, तार्किक और खोजी शक्ति कुंद हो गयी| “रेकी” सिग्नल्स की तरह ही मेरे तर्क कुतर्क सब दीवारों से टकरा कर लौट आये है| दिल दिमाग़ स्वीकार नहीं करता पर सदायें लौट कर आती है तब लगता है “कुछ तो है|”
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 - डॉ गिरिजेश सक्सेना,भोपाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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