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कहानी : दो बहनें - प्रतिभा जैन , नवी मुंबई


कहानी : 

दो बहनें

      दिव्या दीदी मेरी नन्द अभी कुछ ही दिन पहले दुबई से बैंग्लोर आये लेने हादसे में चल बसी वो जीजाजी तो अभी तक उस हादसे को भूल नहीं पाये थे जब वो उन्हें लेने एयरपोर्ट गये हुए थे और अचानक एक पल में सब खो गया।
मेरी दीदी सन्ध्या आज बैंगलोर से सुबह 11 बजे मेरे घर पहुँची । दूरअंचल में मैंने अभी 20 दिन पहले दो जुड़वा बेटियाँ को जन्म दिया था दोनों ही इतनी प्यारी है कि जैसे परियों का जोड़ा। सास ज्यादा दिन रुक नहीं पायी, इसलिए दीदी आयी थी, वैसे भी उनकी बेटी दिल्ली में पढ़ती है । जब तब आती रहती है और अक्सर  रात मेरे घर ही रुका करती है ।  यहाँ उन्हें मेरे साथ रहना अच्छा लगता है। आते ही सब से मिली जुली । पहले खुद ही  नाश्ता किया फिर नहा धाकर दोपहर को खाना बना लिया ।  खाना ऐसा बना लेती कि कम न पड़े । बाकी व्यवस्थाओं के बावजूद खाना वाना बनाकर टेबल लगाकर तैयार करती और लम्मा आकर मेरे पास बैठ कर खूब सारी बाते करती रही । दोनों बच्चों को सम्भालते हुए बोली देख तेरे परियों का नाम ये मौसी रखेगी बोल है ना मन्जूर, कोई बुरातो नहीं मानगा? हाँ हाँ दीदी क्यों ऐसी बात करती हो । आप ही रखना । बताओ क्या सोच कर आयी हो तो फिर सुन एक का नाम श्रीदा दूसरी का नाम आया है ना दोनों नाम एक से। ठीक है दीदी है ।  मेरे नन्दोई जी आये हुए थे सो खाने के टेबल पर काफी देर बात चीत का दौर चलता रहा और सबने दीदी की खूब तारीफ की। वो है ही तारीफ करने लायक। वो तो सबको को ऐसे चुटकी में खुश कर लेती है कि सामने बाला उनका कायल हो जाता है।
सन्ध्या दीदी के पती यानी मेरे जीजू चार साल पहले गुजर चुके थे। ब्रेन हैम्रेज में उनकी मौत हो गयी थी तभी से दीदी कुछ उदास सी रहती थी मगर ये उदासी वो हमेशा लादकर नही रखती थी। बड़ा बेटा बैंगलोर में ही पढ़ रहा था। दोनों बच्चे शुरू से ही हॉस्टल में पढ़े थे । जीजु की डेथ के बाद दीदी शिशिर यानी अपने बेटे के साथ ही रह रही थी। हम तीन बहन है बड़ी सन्ध्या दीदी दूसरी और छोटी विया जो अभी दो साल पहले दुबई चली गयी थी । जीजू दीदी और मेरी मेरे हस्बन्ड रोहित सबकी आपस में खूब पटती थी । हर बार हम इधर उधर जाने के प्रोग्राम साथ ही बनाया करते थे। एक बार हम लोग चंडीगढ़ गए हुए थे। वहाँ अचानक बारिश हो गयी तो जीजू बोले सुनो हम तो ऐसी बरसात में वालों जी के साथ पकोड़ा और चाय का नाश्ता शेयर करेंगे भाई अगर किसी को अच्छा ना लगी तो वो उसकी मज़बूरी हमको तो बरसात का मज़ा लेना है । मेरे पति तो थोड़े संकोची है दीदी तपाक से बोली चलो हमारी जूती हमारे पास भी पार्टनर है ना। और सब हँसने लगे। यूही कितने ही विन्सियस होते थे जो हँसते हँसाते गुज़र जाते थे, मेरा बेटा नीशू अपनी मौसी पर फ़िदा था काश ये हमारी मासी ना होकर सिर्फ माँ होती तो कितनी अच्छी होता ।  मम्मा दीदी भी लपक कर कहती तू मेरे साथ ही चल मैं ही तेरी मम्मा हूँ ।
पूरा दिन यूही पिछली यादों में बीत गया रात को दीदी ने दाल मखुर रायता पालक सलाद सब बनाया और सब खाने बैठे, अचानक पता लगा कि सूजल मेरे नन्दोई जी को वो खाना बहुत ही पसन्द है और उन्होंने जो दबाकर  खाए कि सबको हँसी छूट गई क्योंकि आखिर में दीदी को तो पूरी बनाकर खानी पड़ी ।
 दरअसल सजन जी को तो दीदी की हर बात हर अदा हर काम इतना प्रभावित कर रहा था कि उन्हें लग रहा था जैसे उनकी जान को संतोष मिल गया हो । वो मन ही मन दीदी पर फ़िदा थे मगर क्रियाओं से भी कुछ बोल नहीं बन रहा था। दीदी इस सब से बिल्कुल अनजान अपनी ही दुनिया में अपनी PHONES उघाड़ बुं में लगी थी । अगला दिन सजल को जाना था दुबई । उनका टिकट हुआ था, मगर न जाने क्या बात हुई सुबह उठकर बोले इस बार दुबई जाने का मन नहीं कर रहा, सोच रहा हूँ दिल्ली के २,४ काम है निपटकर दो ३ दिन बाद जाऊँगा। इस बीच हम सब लोग वहाँ आस पास पिकनिक पर चलेंगे, मैंने कहा जीजाजी मैं तो नहीं जा पाऊँगी दोनों छोटी बच्चियों के साथ फिर कभी चलेंगे या फिर मैं घर रहूँगी आप सब लोग चले जाना । दीदी बोली मैं भी तेरे साथ यहीं रहूँगी, ये लोग आज ही देख आयेंगे। पर नहीं प्रोग्राम कैंसिल हो गया और
शाम को बाहर जाने का प्रोग्राम बन गया मैं घर रही और बाकी सारे लोग बाहर रवाना हो गये, दीदी मेरी खिचड़ी बनाने बैठ गयी थी । नो बजे तक लोग घर नहीं आये तो मैंने लेकर खाना खा लिया । पापा आकर बोले अरे तुम आ जाना ये लोग घूमघाम कर आयेगें । सजल बोल रहे थे थोड़ी दूर पार्क में बैठेंगे । सुजाता पास ही हवा का मज़ा लेंगे, दरअसल उन्हें दीदी का आस पास होना अच्छा लग रहा था और वो ज्यादा से ज्यादा वक्त साथ बिताना चाह रहे थे । सुबू लोरी इस बात से बेखबर थे कल की ख्याल भी ना था अचानक उन्होंने बैठ बैठे ही सजल से कहा देखो एक बात बस बुरा तो नहीं मानोगे नहीं मँगा कहती हूँ आपकी पूरी लाइफ पड़ी है आपको अपनी दूसरी शादी कर लेनी चाहिए । यू कि इस समय आपको किसी हमसफ़र की बहुत जरूरत है ।आपके बच्चे है । कम से कम उसे सम्भालने के लिए ताकी दी चाचा दीदी । अगर आप भी अभी बहुत कहते रुक गयी । दीदी सजल तो जैसे चाह ही रहे थे कि कोई ऐसा टॉपिक छुड़े मगर उन्हें दीदी सजल वैशाली से कोई उम्मीद नही थी । सजल पहले तो चुप रहे फिर रोहित भी बोले सुजाता जी  अपनी ओर तो देखिये लगता ही नहीं कि आपके दो बच्चे भी है और फिर आगे आगे जब उम्र ढलने लगेगी तो आपको जीवन साथी की कमी बहुत अखरेगी । अरे मै अब साथी नही ढूँढ़गी जो था वो छोड़कर चला गया । उसने ही नहीं सोचा और मन दुःखी करने लगी। रोहित भी मौके की नज़ाकत को देख जरा चुप रह मगर इतने में चुप्पी को तोड़ते हुए मेरा बेटा बोला मम्मा मेरे पास एक आइडिया है, हाँ बोलना देखो मौसी के भी वाजी नहीं है और आपके कुआवी नहीं है तो आप दोनों ही शादी कर लेना कैसा लगा मेरा आइडिया, रोहित बोले चुप बडो के बीच में बच्चा को ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए। बात बच्चे के मुँह से निकली मगर असर दार थी । रोहित गहराई से सोचने लगे और उन्होंने जीजाजी को उकसाया कि ऐसा हो सकता है अगर सन्ध्या के मन में भी  लहर जागी और वो सोचने पर मजबूर हो गयी। अगले दिन से दोनों एक दुसरे से कतराने लगे। लेकिन रात वाली बात पापा के कानों तक पहुँच गयी और उन्होंने प्रस्ताव दोनों के आगे रख दिया, भुवन तो मन ही मन जीजू के पास रहने से उनकी और भी हिम्मत बढ़ गयी थी दीदी को भी मना लिया, तय ये हुआ कि 15 दिन का समय है सोचने का इस बीच दीदी अपने बच्चों को भी मना टटोल लेगीं । सजल की बेटी तो अभी १ साल की ही थी सो उसे तो मम्मा जैसी चीज मिलना अच्छा ही लगता सो वहाँ कोई समस्या नहीं थी उधर भी 15 दिन बाद जवाब हाँ में आ गया, पहले सब मिलकर दुबयी घूमने गये बाद में शादी हुई । सन्ध्या दीदी और सजल जीजू एक हो गये (साधारण सी शादी हुई) तीनों बच्चों को एका भरा पूरा परिवार मिला, बात ही बात में कितनी बड़ी समस्या हल हो गयी। धन्यवाद 'रॉबिन अरे इसी बात पर कुछ मीठा हो जाये लाओ मेरी चाकलेट, धत बदमाश.

 - प्रतिभा जैन , नवी मुंबई
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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