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रुद्राभिषेक का धार्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व- डाॅ०राकेश सक्सेना , एटा



रुद्राभिषेक का धार्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक महत्व

- डाॅ०राकेश सक्सेना , एटा

रुद्राभिषेक रुद्र व अभिषेक दो शब्दों से मिलकर बना है। ' रुद्र ' भगवान शिव का एक नाम है। इसका अर्थ है रुद् धातु से रुदन या दु:ख को दूर करने वाला। शिव को रुद्र इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वे भक्तों के दु:खों, कष्टों व रोगों को हर लेते हैं। ' अभिषेक ' अभि+सिच् अर्थात् चारों ओर से स्नान कराना। इसका तात्पर्य है कि जल, दूध,घी, शहद, गंगाजल, बेलपत्र, आक, चंदन आदि से शिव को स्नान कराना। इस प्रकार इसका शाब्दिक अर्थ हुआ- भगवान शिव का अभिषेक। भारतीय सनातन परम्परा में यह अनुष्ठान सर्वाधिक प्रभावशाली माना जाता है, जो प्रकृति, चेतना, आत्मशुद्धि और लोककल्याण की भावना से जुड़ा है। इस आध्यात्मिक संस्कार व पूजा पद्धति का धार्मिक, दार्शनिक व वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व रहा है। सनातन परम्परा में भगवान शिव सर्वोच्च शक्ति हैं, जिनको आशुतोष भी कहा गया है। वे शीघ्र प्रसन्न होने वाले देव हैं। श्रद्धा, विनम्रता और निष्काम भाव से किया गया रुद्राभिषेक ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह अभिषेक आत्मशुद्धि का माध्यम है। जल की प्रत्येक धारा भक्त को संदेश देती है कि अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, लोभ, ईर्ष्या व द्वेष को धोने का प्रयास करें। भगवान शिव समस्त सृष्टि के अधिपति हैं, इसलिए बेलपत्र, जल, पुष्प, चंदन, आक, धतूरा आदि प्राकृतिक सामग्री इस भाव की सूचक है कि प्रकृति की रक्षा ही शिव पूजा है। श्रावण मास वर्षा के द्वारा प्रकृति को नवजीवन देता है,मनुष्य को आत्मचिंतन हेतु प्रेरित करता है, इसलिए संयम,तप,जप शिवोपासना व रुद्राभिषेक हेतु यही समय सर्वाधिक उपयुक्त है।
       भारतीय दर्शन में शिव परम चेतना के प्रतीक हैं, इसलिए रुद्राभिषेक मूर्तिपूजा से आगे बढ़कर ब्रह्मांडीय चेतना के प्रति समर्पण का द्योतक बन जाता है। यह अनुष्ठान सृष्टि, स्थिति और संहार का संतुलन करना भी सिखाता है। शिव संहार के देवता अवश्य हैं किन्तु भारतीय दर्शन में संहार केवल विनाश के लिए नहीं अपितु नवसृजन के लिए आवश्यक परिवर्तन है, जो नई सम्भावनाओं के द्वार खोलता है। रुद्राभिषेक में जल ऊपर से नीचे प्रवाहित होता है। यह इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य कितना भी ऊँचा हो जाए लेकिन विनम्र रहे। भगवान शिव के समक्ष सभी भेद समाप्त हो जाते हैं तथा पद, प्रतिष्ठा,जाति,धन आदि गौण हो जाते हैं। भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टि पंचमहाभूतों से निर्मित है,इसलिए ये अनुष्ठान इनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी एक सांस्कृतिक माध्यम है। जलाभिषेक जल के महत्व को, दीप अग्नि को, धूप वायु को, भस्म पृथ्वी को तथा मंत्रों की ध्वनि आकाश तत्व का प्रतीक मानी जाती है। अद्वैत वेदांत के अनुसार परमात्मा और आत्मा का मूल स्वरूप एक ही है। रुद्राभिषेक का उद्देश्य बाह्य पूजन से आगे बढ़कर आंतरिक शिवत्व को जाग्रत करना है।
     वैज्ञानिक दृष्टि से रुद्राभिषेक का प्रमुख आधार वैदिक मंत्रों का उच्चारण है, जो स्वर, लय और छन्द में गाए जाते हैं। ध्वनि विज्ञान के अनुसार नियमित लयबद्ध ध्वनि मन को एकाग्र करने एवं नियंत्रित श्वास- प्रश्वास के साथ मंत्रोच्चारण तनाव कम करने में सहायक बनते हैं। मनोविज्ञान की दृष्टि से जलाभिषेक चिंताओं का मानसिक विसर्जन करते हैं, सकारात्मक संकल्प लेते हैं। रुद्राभिषेक के समय भक्त का ध्यान एक बिन्दु पर केन्द्रित रहता है। यह प्रक्रिया ध्यान के अनेक सिद्धांतों से मेल खाती है, मानसिक तनाव में कमी आती है और क्रोध व आवेग पर नियंत्रण होता है। आज के भौतिकवादी युग में जहाँ मानसिक तनाव, सामाजिक विघटन, पर्यावरण संकट,उपभोक्तावाद, नैतिक मूल्यों का ह्रास है वहाँ रुद्राभिषेक प्रकृति के साथ संतुलित जीवन, संयमित उपभोग, विनम्रता, आत्मचिंतन, लोकमंगल के सार्थक भाव को सिखाता है।
      सारत: रुद्राभिषेक भारतीय आध्यात्मिक परम्परा का ऐसा अमूल्य अनुष्ठान है,जो धार्मिक दृष्टि से भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है। दार्शनिक दृष्टि से अहंकार,त्याग, आत्मबोध और ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ने की साधना है तो वहीं पर वैज्ञानिक दृष्टि से ध्यान, नियंत्रित श्वसन,लयबद्ध मंत्रोच्चारण,सामूहिक सहभागिता आदि में हितकर है, सामाजिक समरसता, लोकसंस्कृति का संरक्षण आदि का सार्थक व सशक्त माध्यम भी है। इस अनुष्ठान के द्वारा मनुष्य के व्यक्तित्व को परिष्कृत करके उसे समाज, सृष्टि व सृष्टा के प्रति उत्तरदायी बनाया जा सकता है।
                         
- डाॅ. राकेश सक्सेना, पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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