आलेख :
सफलता आगे, ज़िन्दगी पीछे
“पापा, आज भी देर से आएँगे?” आठ वर्षीय आरव ने पूछा।
“बस बेटा, यह प्रोजेक्ट पूरा हो जाए, फिर हम खूब समय बिताएँगे,” पिता ने लैपटॉप से नज़र हटाए बिना कहा।
“आपने यह बात पिछले रविवार भी कही थी,” आरव धीरे से बोला और अपनी बनाई तस्वीर मेज़ पर रखकर चला गया।
हम सब किसी-न-किसी दौड़ में भाग रहे हैं। कोई पद चाहता है, कोई पैसा, कोई प्रसिद्धि। हम स्वयं से कहते हैं- “थोड़ी-सी और मेहनत, फिर आराम करेंगे।” लेकिन यह “फिर” अक्सर कभी आता ही नहीं।
सफलता बुरी नहीं है। आगे बढ़ने की इच्छा ही मनुष्य को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाती है। समस्या तब शुरू होती है, जब मंज़िल पाने की जल्दी में हम रास्ते के सुंदर क्षणों को अनदेखा कर देते हैं। बच्चों की बातें, माता-पिता का इंतज़ार, मित्रों की हँसी और अपने मन की शांति धीरे-धीरे पीछे छूटने लगती है।
एक दिन थका हुआ मन पूछता है- “मैंने इतना कुछ पाया, फिर भी खालीपन क्यों है?” उत्तर सरल है- हमने उपलब्धियाँ तो जोड़ लीं, पर जीवन से जुड़ना भूल गए।
सच्ची सफलता वह नहीं, जिसकी कीमत रिश्तों और स्वास्थ्य से चुकानी पड़े। काम आवश्यक है, पर विराम भी उतना ही जरूरी है। परिवार के साथ बैठना, स्वयं से बात करना और छोटे सुखों को महसूस करना समय की बर्बादी नहीं, जीवन की कमाई है।
दौड़िए अवश्य, पर कभी रुककर देखिए- कहीं सफलता आगे और ज़िन्दगी पीछे तो नहीं छूट रही। क्योंकि अंत में हमारी पहचान उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उन लोगों की मुस्कान से होती है, जिन्हें हमने अपना समय दिया।
- डॉ. रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
करनाल
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