स्वतंत्रता दिवस का बदलता स्वरूप: उत्सव से उत्तरदायित्व तक
- डाॅ.राकेश सक्सेना ,एटा
भारतीय स्वतंत्रता दिवस पन्द्रह अगस्त को मनाया जाने वाला केवल राष्ट्रीय पर्व नहीं अपितु हमारी अस्मिता, लोकतांत्रिक चेतना, स्वतंत्रता संग्राम की स्मृति और नागरिक उत्तरदायित्व का जीवंत प्रतीक है। 15 अगस्त 1947 ई० को औपनिवेशिक शासन से मुक्ति प्राप्त करने के बाद इस दिवस का स्वरूप समय के साथ निरंतर परिवर्तित हुआ है। प्रारम्भिक दशकों में यह स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, बलिदान,राष्ट्रीय एकता व अखण्डता का प्रमुख अवसर था तदन्तर इसमें विकास, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, तकनीकी प्रगति, युवा आकांक्षाओं के तत्व जुड़ते चले गए लेकिन इसी के साथ यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या इस दिवस को ध्वजारोहण, वंदेमातरम्- राष्ट्रगान, सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक ही सीमित रखा जाए? आज इस दिवस को आत्ममंथन और उत्तरदायित्व के राष्ट्रीय दिवस के रूप में भी देखे जाने की आवश्यकता है,क्योंकि स्वतंत्रता प्राप्त करना एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी लेकिन स्वतंत्रता को बनाए रखना निरंतर नागरिक का उत्तरदायित्व है।
स्वतंत्रता दिवस के पारंपरिक आयोजनों में ध्वजारोहण, राष्ट्रगान, भाषण, प्रभात फेरी, सांस्कृतिक कार्यक्रम, देशभक्ति गीत आदि प्रमुख थे किन्तु आधुनिक समय में विद्यालय-महाविद्यालय स्तर पर भाषण प्रतियोगिता, निबंध लेखन, प्रश्नोत्तरी, चित्रकला, वृक्षारोपण, रक्तदान, स्वच्छता अभियान, सामुदायिक सेवा, ऑनलाइन जागरूकता अभियान आदि नये माध्यम जुड़ गए। इस परिवर्तन का सकारात्मक पक्ष यह है कि स्वतंत्रता दिवस मंचीय कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहा, नागरिकों को सामाजिक कार्यों से जोड़ने की सम्भावनाओं में वृद्धि हुई है। देश का संविधान नागरिकों को अधिकार प्रदान करता है किन्तु स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता या मनमानी नहीं है। इस सन्दर्भ में स्वतंत्रता दिवस संविधान के मूल्यों,न्याय, समानता और बंधुत्व पर पुनर्विचार का अवसर बना सकता है। स्वतंत्रता दिवस की समकालीन आवश्यकता उत्सव से उत्तरदायित्व की ओर ले जाने की है। राष्ट्र के निर्माण में प्रत्येक नागरिक की भूमिका होती है। एक छात्र का ईमानदारी से अध्ययन करना, शिक्षक का गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना, चिकित्सक का पेशे के प्रति निष्ठावान रहना, किसान का कृषि उत्पादन में योगदान देना, वैज्ञानिकों का शोध करना, नागरिकों द्वारा कानून का पालन करना आदि सभी रूप राष्ट्रसेवा के अंतर्गत आते हैं।
नागरिक उत्तरदायित्व के आयामों में संवैधानिक मूल्यों के सम्मान के साथ सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा,पर्यावरणीय जिम्मेदारी, सामाजिक समरसता, डिजिटल व्यवहार आदि शामिल हैं। भारतीय युवा पीढ़ी जिसकी आबादी बहुत बड़ी है,उसको समझाना आवश्यक है कि आज के भारत में उनकी भूमिका क्या है? शिक्षा के माध्यम से इनको शोध, संवाद और सामाजिक कार्यों से जोड़ा जा सकता है। स्वतंत्रता दिवस के स्वरूप को व्यापक बनाने में मीडिया तथ्यपरक इतिहास और विवेकपूर्ण नागरिक विमर्श को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। स्वतंत्रता का आधुनिक अर्थ स्वस्थ व सुरक्षित जीवन से भी जुड़ा है एतदर्थ वृक्षारोपण, जल संरक्षण, ऊर्जा की बचत, प्लास्टिक उपयोग में कमी, पर्यावरण की रक्षा जैसे प्रयासों को स्वतंत्रता दिवस का हिस्सा बनाया जा सकता है। भारत की पहचान विविधता में एकता है इसलिए विविधता के सम्मान और सामाजिक संवाद को बढ़ावा देना आवश्यक है। उत्तरदायित्व दिवस बनाने हेतु एक दिन के इस आयोजन को पूरे सप्ताह का नागरिक अभियान बनाकर इसकी प्रासंगिकता को बढ़ावा दिया जा सकता है।
भारतीय इतिहास की महानतम उपलब्धियों में स्वतंत्रता दिवस का स्वस्थ स्वरूप अधिकार, कर्तव्य और उत्तरदायित्व में ही समाहित है। अधिकार व्यक्ति की गरिमा को सुनिश्चित करते हैं, कर्तव्य सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करते हैं और उत्तरदायित्व नागरिक व्यवहार को नैतिक दिशा देता है। यह दिवस हम सभी से यही पूछता है कि हम देश से क्या प्राप्त कर रहे हैं और देश को क्या दे रहे हैं? इस दृष्टि से स्वतंत्रता केवल प्राप्त करने की उपलब्धि नहीं, उसे जिम्मेदारी से जीने की निरंतर साधना है। अत: उत्सव से उत्तरदायित्व का चरण वर्तमान को बेहतर और भविष्य को सुरक्षित करने में सहायक सिद्ध हो सकता है।
- डाॅ. राकेश सक्सेना,
पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर,
एटा ( उ०प्र० ) 207001
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