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स्वतंत्रता दिवस - आज़ादी की मशाल अब हमारे हाथों में - डॉ. रीटा अरोड़ा ,करनाल



आलेख : 

स्वतंत्रता दिवस - आज़ादी की मशाल अब हमारे हाथों में

     15 अगस्त केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह वह दिन है, जिसके पीछे अनगिनत बलिदानों की करुण गाथा छिपी है। जब हम खुले आकाश के नीचे तिरंगे को लहराते देखते हैं, राष्ट्रगान गाते हैं और गर्व से कहते हैं कि हम स्वतंत्र भारत के नागरिक हैं, तब शायद हम यह भूल जाते हैं कि इस स्वतंत्रता की कीमत कितनी भारी थी।

आज जिस हवा में हम बेखौफ सांस लेते हैं, उसमें उन शहीदों की अंतिम सांसें भी घुली हुई हैं, जिन्होंने देश के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए। किसी मां ने अपना बेटा खोया, किसी पत्नी ने अपना सुहाग, किसी बहन की राखी सूनी रह गई और किसी बच्चे ने पिता की उंगली पकड़ने से पहले ही उन्हें मातृभूमि के चरणों में खो दिया। उन्होंने अपने सपनों को अधूरा छोड़ दिया, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां अपने सपनों को पूरा कर सकें।

भगत सिंह जब फांसी के फंदे की ओर बढ़े होंगे, क्या उन्हें जीवन से प्रेम नहीं रहा होगा? 
चंद्रशेखर आज़ाद के मन में क्या अपने परिवार की याद नहीं आई होगी? 

असंख्य अनाम स्वतंत्रता सेनानी, जिनके नाम इतिहास की किताबों में शायद दर्ज भी नहीं हैं, अपने घरों से निकले और फिर कभी लौट नहीं पाए। उनके घरों के दरवाजे वर्षों तक उनकी प्रतीक्षा करते रहे होंगे।

कितना कठिन रहा होगा वह क्षण, जब एक मां को यह समाचार मिला होगा कि उसका जवान बेटा अब कभी वापस नहीं आएगा। आंखों से आंसू बहते रहे होंगे, पर होंठों पर शायद यही शब्द रहे होंगे - “मेरा बेटा देश के काम आया।”

यही हमारी आज़ादी की असली कीमत है।

आज हम स्वतंत्र हैं। हमें बोलने की स्वतंत्रता है, शिक्षा पाने का अधिकार है, अपने सपनों को चुनने का अवसर है और अपने भविष्य को स्वयं गढ़ने की शक्ति है। लेकिन स्वतंत्रता केवल अधिकारों का नाम नहीं है, यह जिम्मेदारियों का भी नाम है।

आज देश की युवा पीढ़ी के हाथों में वह “आज़ादी की मशाल” है, जिसे हमारे पूर्वज अपने रक्त से जलाकर हमें सौंप गए। प्रश्न यह नहीं है कि हमें स्वतंत्रता कैसे मिली; प्रश्न यह है कि हम इस स्वतंत्रता के साथ क्या कर रहे हैं।

युवाओं को यह समझना होगा कि देशभक्ति केवल 15 अगस्त को तिरंगा लगाने या सोशल मीडिया पर संदेश लिखने तक सीमित नहीं है। ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाना, भ्रष्टाचार से दूर रहना, जरूरतमंद की सहायता करना, महिलाओं का सम्मान करना, पर्यावरण की रक्षा करना और देश की एकता को सर्वोपरि रखना भी सच्ची देशभक्ति है।

हमारे शहीदों ने हमें एक स्वतंत्र भारत दिया था; अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम आने वाली पीढ़ियों को एक मजबूत, शिक्षित, संवेदनशील और एकजुट भारत सौंपें।

जब अगली बार तिरंगा आकाश में लहराए, तो केवल गर्व से उसे न देखें। एक क्षण उन चेहरों को भी याद करें, जो हमारी मुस्कान के लिए हमेशा के लिए मिट गए।

अपने मन से पूछें -

“क्या मैं उस आज़ादी के योग्य नागरिक बन रहा हूं, जिसके लिए किसी ने अपना पूरा जीवन दे दिया?”

आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर प्रण लें कि शहीदों से मिली इस आज़ादी की मशाल को कभी बुझने नहीं देंगे। इसे अपने कर्म, चरित्र और देशप्रेम से और अधिक प्रज्वलित करेंगे तथा गर्व से अगली पीढ़ी के हाथों में सौंपेंगे।

क्योंकि आज़ादी हमें विरासत में मिली है, लेकिन उसकी रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है।

जय हिंद! जय भारत!

- डॉ. रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
करनाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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