काव्य :
ज्ञान दायिनी मां की वंदना
ज्ञान दायिनी अमृत स्वर दो
सम्मति रोम रोम में भर दो
पर हित भाव भरी दो रचना
मानवता की हो संरचना
दानवता के पंख कतर दो
सदविवेकी हों बालक तेरे
मां कोई भ्रम जाल ना धेरे
अंतःकरण ब्रह्ममय कर दो
रीते ना हों कासे मन के
पुष्प भरो मां नमन अमन के
मन गंगा तन चंदन कर दो
- ऋतेश कुमार साहनी , बरेली
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