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काव्य : अखण्ड राष्ट्र - आनंद जैन "अकेला" , कटनी


काव्य : 

अखण्ड राष्ट्र

देश हमारा प्राण से प्यारा,अखण्ड राष्ट्र हो सपना है।
होने न देंगे टुकड़े इसके,ऐसा संकल्प ये अपना है।।

इस धरा पे हमने जनम लिया,जां दे कर इसे बचाना है।
कोने-कोने को सुंदर सी, रांगोली से सजाना है।।

अजान करें निर्भय हो कर,मंदिर में घंटे बजते हैं ।
निडर और निर्भीक प्रजाजन, सौम्य भाव से रहते हैं।।

पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्खिन,यहां दसों दिशाएं रमती हैं।
प्राणिमात्र यहां रहे सुरक्षित, वेद-ऋचाएं कहतीं हैं।।

अखण्ड ज्योति से आप्त ये भारत, पग-पग नई कहानी है।
आल्हा-ऊदल-बुंदेलों की,हमें चर्चा चढ़ी जुबानी है।।

वसुधा के कण-कण में यारो,देवों की शक्ति समाई है।
ये देव भूमि ऐसी है जहां,नारायण ने धूनी रमाई है।।

आजाद-भगत-बिस्मिल ने अपने,खून से इसको सींचा था।
पापी फिरंगियों ने शहीद की ,जिंदा चमड़ी को खींचा था।।

है पवित्र यह धरा हमारी,यहां सतियां जौहर करतीं थीं।
लूट सके न कोई अस्मत, अग्निस्नान कर मरतीं थीं।।

इस धरती के हैं ऋणी सदा हम,इसका कोई मोल नहीं।
कोई आँक सके इसकी कीमत, बनी जुबां और बोल नहीं।।

इस राष्ट्र में रहने वालों ने,बस अभय दान ही पाया है।
इसकी रक्षा खातिर वीरों ने,प्राणों को गंवाया है।।

कोई कुदृष्टि से देखे तो,हम नेत्रहीन उसको कर दें।
फाड़ के सीना रक्त बहा दें,भूमि शोणित से तर कर दें।।

मरना -जीना है देश की खातिर, हम सौगंध उठाते हैं।
होते हैं नेक भारतवासी,हम दुनिया को बतलाते हैं।।

प्राची से होता उदित सूर्य, धरणी को सुनहरा कर देता ।
मुक्ता-माणिक-हीरे-पन्ना से,इसको "अकेला" भर देता।।

 - कवि आनंद जैन "अकेला" , कटनी 
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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