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लंदन डायरी :स्वास्थ्य सेवा घर की काल बेल बजाती है यहां - विवेक रंजन श्रीवास्तव


लंदन डायरी :

स्वास्थ्य सेवा घर की काल बेल  बजाती है यहां 

भारतीय मन लंदन में रहते हुए सदैव दोनों देशों की व्यवस्था में तुलनात्मक अध्ययन करता रहता है। बच्चे का जन्म और उसके बाद मां तथा नवजात की देखभाल के मुद्दे पर यह अनुभव जन्य विवेचना।

भारत में बच्चे का जन्म सामान्यतः केवल मां और डॉक्टर के बीच का मामला नहीं रहता। वह पूरे परिवार का उत्सव होता है और निर्णयों में परिवार की सक्रिय भूमिका भी दिखाई देती है। पति, माता-पिता, सास-ससुर, सबकी अपनी राय होती है, खासकर इन दिनों प्रसव सिजेरियन होगा या सामान्य इसमें पति या परिवार का निर्णय हावी नजर आता है। ब्रिटेन में मैंने जो अनुभव देखा, उसमें केंद्र कहीं अधिक स्पष्ट था, मां की इच्छा, उसकी सुरक्षा और बच्चे के स्वास्थ्य को लेकर उसके स्वयं के निर्णय।

गर्भावस्था के दौरान नेशनल हेल्थ स्कीम ( NHS )की maternity service में midwife की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। महिला की नियमित जांच होती है, आवश्यक परीक्षण और प्रसव से जुड़े विकल्पों की कंप्यूटर पर जानकारी दर्ज कर नियमित सूचना दी जाती है।
चौथे महीने में ही बेबी का सेक्स नियमित सोनोग्राफी जांच में बता दिया जाता है।
 सामान्य परिस्थितियों में प्रसव कहां हो, उपलब्ध विकल्प क्या हों और प्रसव की योजना कैसी हो,इन विषयों पर महिला की पसंद को ही प्रथम महत्व दिया जाता है। जोखिम होने पर चिकित्सकीय सुरक्षा स्वाभाविक रूप से प्राथमिकता बन जाती है।

मुझे यह बात खास लगी कि यहां प्रसूता को केवल उपचार प्राप्त करने वाली 'patient' के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि अपने शरीर और अपने बच्चे के बारे में निर्णय लेने वाली व्यक्ति के रूप में देखा जाता है। चिकित्सा-विज्ञान और व्यक्तिगत स्वायत्तता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही प्रक्रिया के  हिस्से हैं।
 असली आश्चर्य बच्चे के जन्म के बाद सामने आया।
हमारे यहां सामान्यतः मां और नवजात को जांच के लिए अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र ले जाना पड़ता है। कई सरकारी अस्पतालों में तो जांच कराने के लिए लंबी कतार भी व्यवस्था का परिचित हिस्सा है।
 लंदन में इसके उलट स्वास्थ्य-व्यवस्था का एक हिस्सा जैसे कहता है, हर बार मरीज को स्वास्थ्य सेवा तक पहुंचने की जरूरत नहीं; जहां संभव हो, स्वास्थ्य सेवा मरीज तक पहुंचे।

बच्चे के जन्म के बाद midwife मां और नवजात की देखभाल करती है। उसके बाद health visitor की भूमिका शुरू होती है। वह बच्चे के स्वास्थ्य और विकास से जुड़े पहलुओं को देखता है और माता-पिता को आवश्यक सलाह देता है। जरूरत के अनुसार घर पर ही संपर्क और जांच की व्यवस्था हो सकती है।

नवजात बच्चे के साथ मां को बार-बार अस्पताल की यात्रा न करनी पड़े, यह केवल सुविधा नहीं है; यह उस व्यवस्था की संवेदनशीलता है जो प्रसव के बाद की नाजुक अवस्था को समझती है।

यहीं मुझे लगा कि स्वास्थ्य सेवा का अर्थ केवल अस्पताल और डॉक्टर नहीं है। स्वास्थ्य सेवा का अर्थ है, व्यक्ति की जरूरत के समय उसके पास पहुंचना।

इस व्यवस्था का आर्थिक पक्ष भी कम दिलचस्प नहीं है।  NHS की maternity services सार्वजनिक व्यवस्था के माध्यम से उपलब्ध होती हैं। प्रसव के लिए निजी अस्पताल जैसा बड़ा प्रत्यक्ष खर्च परिवार को सामान्यतः नहीं उठाना पड़ता। इसका आधार है,करों और अन्य सार्वजनिक राजस्व से संचालित NHS।

यहां नागरिक और राज्य के बीच एक दिलचस्प सामाजिक अनुबंध दिखाई देता है,आज नागरिक कर देता है, कल बीमारी या प्रसव जैसी जरूरत में वही सार्वजनिक व्यवस्था उसके साथ खड़ी होती है।

लंदन में मुझे यह भी जानना रोचक लगा कि करदाता को Annual Tax Summary के माध्यम से यह बताया जाता है कि सरकार के कुल सार्वजनिक खर्च में स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों की हिस्सेदारी कितनी है। यह व्यक्ति के टैक्स की पाई-पाई का हिसाब नहीं होता; उसका कर साझा सरकारी कोष में जाता है। लेकिन सार्वजनिक खर्च का यह अनुमानित विभाजन नागरिक को यह समझने का अवसर देता है कि उसके कर से समाज की कौन-कौन सी व्यवस्थाएं चलती हैं।

इसमें एक महत्वपूर्ण नागरिक-बोध छिपा है ,टैक्स केवल सरकार को दिया गया पैसा नहीं, वास्तव में वह समाज में हमारा साझा निवेश है।

फिर भारत याद आता है।
भारत को केवल अस्पतालों की भीड़, कतारों और निजी इलाज के खर्च से परिभाषित करना न तो न्यायपूर्ण होगा, न तथ्यपूर्ण। हमारे यहां ASHA कार्यकर्ताओं से लेकर मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों, आयुष्मान भारत और Ayushman Arogya Mandirs तक स्वास्थ्य सेवा को समुदाय के करीब ले जाने के अनेक प्रयास हुए हैं। करोड़ों लोगों तक सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का भारत का अनुभव अपने आप में विशाल और जटिल है।

लेकिन भारत और ब्रिटेन की तुलना करते हुए एक बुनियादी अंतर दिखाई देता है। भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में सरकारी और निजी क्षेत्र साथ-साथ चलते हैं और परिवार का जेब से किया जाने वाला स्वास्थ्य खर्च अभी भी महत्वपूर्ण है। NHS अपेक्षाकृत अधिक एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था है, जिसकी मूल भावना यह है कि स्वास्थ्य सेवा व्यक्ति की भुगतान-क्षमता पर निर्भर न रहे। राज परिवार में भी डिलिवरी आदि NHS के अस्पताल में ही हुई है, यह NHS के स्तर का सूचक है।

फिर भी सवाल यह नहीं होना चाहिए कि ब्रिटेन अच्छा है और भारत खराब। दोनों देशों की परिस्थितियां, जनसंख्या, संसाधन और सामाजिक संरचना अलग हैं। असली सवाल यह है कि ब्रिटेन के अनुभव से भारत क्या सीख सकता है और भारत के अनुभव से ब्रिटेन क्या सीख सकता है।

मुझे NHS की सबसे बड़ी विशेषता शायद उसके बड़े अस्पतालों में नहीं, इस छोटे-से व्यवहार में दिखाई दी, एक नई मां और नवजात को देखने के लिए स्वास्थ्यकर्मी का घर तक आना।
इस प्रक्रिया में एक पूरी सोच छिपी है।
बीमारी होने पर इलाज करना स्वास्थ्य व्यवस्था का एक हिस्सा है, लेकिन गर्भावस्था, प्रसव, नवजात शिशु, पोषण और बच्चे के विकास जैसे जीवन के स्वाभाविक पड़ावों में लगातार साथ बने रहना उससे आगे की बात है। यह इलाज से जनस्वास्थ्य की ओर बढ़ना है।

लंदन में  नवजात को देखने आई midwife और health visitor को देखकर लगा कि यह केवल एक बच्चे की जांच नहीं थी। यह नागरिक और राज्य के बीच बने उस सामाजिक विश्वास की  झलक थी जिसमें नागरिक यह उम्मीद कर सकता है कि जरूरत पड़ने पर सार्वजनिक व्यवस्था उसके साथ खड़ी होगी।

और तब लगा कि सरकार  सचमुच जनकल्याणकारी लगती है, जब वह केवल अस्पताल का पता नहीं बताती, बल्कि जरूरत पड़ने पर आपके घर की घंटी भी बजाती है।

शायद NHS को समझने का सबसे सरल और मानवीय तरीका यही है कि
अच्छी स्वास्थ्य सेवा वह नहीं जो केवल अस्पताल में उपलब्ध हो; अच्छी स्वास्थ्य सेवा वह है जो जरूरत पड़ने पर अस्पताल से निकलकर आपके घर तक आ जाए।

 --विवेक रंजन श्रीवास्तव
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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