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काव्य : प्रेम गीत - डॉ सत्येंद्र सिंह , पुणे, महाराष्ट्र



काव्य : 

प्रेम गीत

गाते जाओ, गाते जाओ, प्रेम के गीत गाते जाओ,
जो भी मिले दीन-दुखियारा, गले उसे लगाते जाओ।

नफरत की हर एक चिंगारी, मिलकर आज बुझानी है,
प्रेम-सुधा की गंग बहाकर, दुनिया नई सजानी है।

जो बाँटें मानव-मानव को, वे बंधन टूट जाने दो,
दिल से दिल का सेतु बनाकर, प्रेम-ध्वजा लहराने दो।

भूखे के घर रोटी पहुँचे, प्यासे को जल भी मिल जाए,
रोती हुई हर माँ की आँखों में,  नया तराना फिर से आए।

जिसके तन पर वस्त्र न हों, अपना आँचल बिछा देना जिसके मन में दर्द भरा हो, अपना ही दिल  थमा देना।

मंदिर मस्जिद बाद में जाना, पहले मन को मंदिर कर,
ईश्वर वहीं विराजेगा जहाँ, प्रेम बहे निष्कलुष निर्झर।

पत्थर में भगवान खोजने वालों, इतना याद रख लेना,
रोते हुए इंसान के आँसू, पहले हँसकर पोंछ सुखा देना।

तलवारों से जग जीता है, यह इतिहास तो पुराना है,
प्रेम से जो दिल जीत सके, वही सच्चा वीर सयाना है।

क्रोध अगर अंगार बने तो, प्रेम उसे शीतल कर देगा करुणा का एक दीप अकेला, युग का तम भी हर लेगा।

आओ ऐसा युग रच डालें, जहाँ रहे  न कोई पराया हो,
हर आँगन में प्रेम खिले, और हर चेहरा मुस्काया हो।

  - डॉ सत्येंद्र सिंह
     पुणे, महाराष्ट्र
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

1 Comments

  1. बहुत सकारात्मक प्रेम गीत है। पूरे विश्व में आज मानवता गीत की जरूरत है।
    हार्दिक बधाई🎉🎊

    लतिका

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