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कहानी : मैं हूँ ना - मधूलिका श्रीवास्तव , भोपाल


कहानी : 

मैं हूँ ना

      फोन की घंटी बजी, नीना ने देखा कि छोटे भैया का फोन था। वह असमंजस में पड़ गई कि आज उनको मेरी याद कैसे आ गई? पिछले कई सालों से उनसे तो सिर्फ नमस्ते नमस्ते ही रह गई थी, झगड़ा कोई नहीं था पर... उसने फोन उठाया
     “अरे नीना! दो दिन बाद राखी है... तुम्हारा किस से रिजर्वेशन है , मैं तुम्हें ले लूँगा।” भैया की व्याकुल सी आवाज़ आई।
    नीना अचकचा गई कुछ बोली नहीं 
     “क्या हुआ भाई! कुछ बोलती क्यों नहीं …।“  भैया ने दुबारा पूछा।
     “भैया। इस बार मैं नहीं आ रही , मेरा मन तैयार नहीं है...“  नीना ने बड़ी मुश्किल से कहा।
     “क्यों! हर साल तो आती हो, इस बार क्या हो गया?”
    “हाँ भैया! मुझसे नहीं आया जाएगा।” कहकर वह रोने लगी।
     “अरे… रोती क्यों हो। बड़े भैया नहीं है तो क्या...  मैं तो हूँ ना… मुझे राखी नहीं  बाँधोगी क्या?”
      “नहीं भैया नहीं भैया...”  कहकर वह फूट-फूट कर रोने लगी और उसने फोन काट दिया।
     वहीं धम से बैठ गई और रोने लगी। रोते-रोते सोचने लगी। माँ पापा के जाने के बाद बड़े भैया ने उनकी जगह ले ली थी। लगता जैसे भैया भाभी नहीं माँ पापा ही हैं।  सभी रस्में इस तरह निभाईं कि मायके की कमी कभी महसूस ही नहीं होने दी ।
     छोटे भैया शहर के जाने-माने डॉक्टर हैं,तो ज़्यादा ही व्यस्त रहते हैं। उन्होंने कभी इस बात को अहमियत नहीं दी। भाभी का भी वही हाल था। हर साल राखी पर वह मायके जाती पर छोटे भैया कभी राखी बंधवाते तो कभी नहीं। उनके लिए ये सब ढकोसले थे। 
        छह महीने पहले ही बड़े भैया का अचानक हृदयाघात से निधन हो गया। नीना को लगा जैसे उसकी तो दुनिया ही खत्म हो गयी। बड़े भैया का जाना उसके लिए क़हर टूटने जैसा था। उसके आँसू थम नहीं रहे थे।
     शाम को उसने अपने पति राजेश से बताया तो वे कहने लगे—
      “नीना! अब छोटे भैया का फोन आ गया है तो चली क्यों नहीं जातीं? अब तो वही हैं तुम्हें एसा नहीं करना चाहिए।”
    नीना कुछ नहीं बोली चुपचाप उसका मुँह  देखने लगी।        
     तभी दरवाजे पर घंटी बजी राजेश ने उठकर दरवाजा खोला और आश्चर्य से बोला 
     “अरे भैया आप… आप कैसे? नीना देखो तो कौन आया है … “ उसने नीना को आवाज़ दी। वह बाहर आई और छोटे भैया को दरवाजे पर खड़ा देख भौंचक्की रह गई फिर दौड़कर उनसे लिपट गई 
     “भैया भैया … “ आगे कुछ बोल ही नहीं पाई ।
“क्यों… मैंने तो सुबह ही कहा था कि *मैं हूँ ना* अब मेरी प्यारी बहन को रोता तो छोड़ नहीं सकता था न। तुमने कैसे सोच लिया कि मैं भूल जाऊँगा , अब तो बड़े भैया की सभी ज़िम्मेदारी मेरी है ।आज भैया के जाने के बाद मुझे त्योहार का महत्व समझ आया , मैं भैया को दक़ियानूसी समझता था पर इस बार जब तुम ने आने से मना कर दिया तो मुझे लगा कि मैं तो अकेला पड़ गया ।सच में ये त्योहार हमें जोड़े रखते हैं।”
 कहते कहते उनका गला भर आया।थोड़ा रुक कर बोले,
मैं सुबह की वापसी की हम दोनों फ्लाइट की टिकट लेकर आया हूँ। तुम झटपट तैयारी कर लो, हमें सुबह ही निकलना है।”
“ओह भैया “ ……
 - मधूलिका श्रीवास्तव 
E- 101/17 शिवाजी नगर 
भोपाल (म.प्र.))462016)
9425007686
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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