श्रावण मास विशेष :
शिव: शिशु से शव तक : जीवन की यात्रा
_एक आध्यात्मिक और तार्किक विवेचन_
*1. प्रस्तावना: शिव कौन?*
हमें अपने जीवनकाल में जन्म से मृत्यु की अलौकिक यात्रा में जिन देवता के प्रथम और बहुतायत दर्शन होते हैं वो हैं देवों के देव महादेव भगवान शिव।
शिव कोई देव मात्र नहीं, अपितु अवस्था हैं। शिव = शव + ई = शव में भी ईश्वर। जहाँ "मैं" खत्म, वहाँ से शिव का आरंभ। इसलिए शिव को _आदियोगी_ भी कहते हैं और _महाकाल_ भी। जन्म से मृत्यु तक की पूरी फिल्म के डायरेक्टर भी वही, दर्शक भी वही।
*2. शिशु: पहला "शिव-सूत्र"*
बच्चा पैदा होता है तो बिल्कुल शिव-स्वरूप होता है।
_तर्क:_ शिशु को न जाति का पता, न धर्म का, न अमीरी-गरीबी का। न कल की चिंता, न परसों का डर। भूख लगी तो रोया, नींद आई तो सो गया।
_अध्यात्म:_ यही _सहज समाधि_ है। यही _निर्विचार अवस्था_ है। उपनिषद इसे "बाल-भाव" कहते हैं। शिव भी दिगंबर हैं, शिशु भी। शिव भी भस्म रमाते हैं, शिशु भी अपनी ही मिट्टी में खेलता है। फर्क सिर्फ इतना – शिशु अनजाने में शिव है, हमें जानकर शिव बनना है।
*3. किशोर से गृहस्थ: विषपान की यात्रा*
युवान होते-होते समाज हमें "हलाहल" पिलाता है – ईर्ष्या, तुलना, वासना, अहंकार।
_तर्क:_ किशोरावस्था में हार्मोन का तूफान, जवानी में महत्वाकांक्षा का, गृहस्थी में जिम्मेदारी का। ये सब विष ही तो हैं। रोज थोड़ा-थोड़ा पीना पड़ता है।
_अध्यात्म:_ शिव ने भी समुद्र-मंथन का विष पिया था। न उगला, न पेट में उतारा। _कंठ में धारण कर लिया – नीलकंठ हो गए।_ संकेत साफ है: जीवन के जहर को न दबाओ, न फैलाओ। साक्षी होकर कंठ तक रखो। गृहस्थी शिव का ही रूप है – भोग में भी योग। पार्वती जी साथ तो हैं, पर वैराग्य चट्टान-सा अडिग है।
*4. वानप्रस्थ: तीसरा नेत्र खुलना*
50-60 के बाद शरीर जवाब देने लगता है, बच्चे अपने रास्ते चले जाते हैं।
_तर्क:_ ये बायोलॉजी है। हॉर्मोन घटते हैं, मोह घटाना पड़ता है। इसे ही "रिटायरमेंट" कहते हैं।
_अध्यात्म:_ यही समय है _तीसरा नेत्र_ खोलने का। दो आँखें दुनिया देखती हैं, तीसरी आँख खुद को देखती है। शिव का तीसरा नेत्र खुला तो कामदेव भस्म। संकेत: जब विवेक की आग जलेगी, वासना अपने आप राख हो जाएगी। वानप्रस्थ = जंगल जाना नहीं, _भीड़ में रहते हुए भी जंगल-सा एकांत_ पैदा करना।
*5. शव: अंतिम "शिव-यात्रा"*
अंत में शरीर छूटता है। लोग कहते हैं "राम नाम सत्य है", पर ले जाते श्मशान हैं – _जहाँ शिव का डेरा है।_
_तर्क:_ मेडिकल साइंस भी मानती है – मृत्यु के बाद शरीर 5 तत्व में बिखर जाता है। मिट्टी, जल, अग्नि, वायु, आकाश।
_अध्यात्म:_ शव = श + व। "श" माने शांति, "व" माने गति। जहाँ सारी गति शांत हो जाए, वो शव। और शव में जब "ई" यानी शक्ति/चेतना जुड़े तो _शिव_। इसलिए श्मशान अशुभ नहीं, _सबसे बड़ी सत्य की संस्था है। शिव वहाँ इसलिए बैठते हैं ताकि हम देख सकें – अंत में न मकान साथ जाएगा, न दुकान। सिर्फ कर्म-व्यय का हिसाब जाएगा।
*6. निष्कर्ष: शिशु से शव तक शिव ही शिव*
_तर्क कहता है:_ जीवन एक बायोलॉजिकल साइकिल है – कोशिका बनी, विकसित हुई, क्षीण हुई, बिखर गई।
_अध्यात्म कहता है:_ ये साइकिल ही शिव का डमरू है। एक तरफ सृजन का "धिन", दूसरी तरफ प्रलय का "नाद"। और बीच का जो गैप है, वही _जीवन_ है, वही _नृत्य_ है – तांडव।
इसलिए शिवजी को केवल पूजनीय न माने _शिवजी को ध्यान में रखते हुए सीखें _.जीवन को पूरा जीना_। शिशु-सा निर्दोष, गृहस्थ-सा जिम्मेदार, नीलकंठ-सा सहनशील, और शव-सा निर्मोही।
_अंतिम सूत्र:_
_"शिशु बनकर आओ, शिव बनकर जाओ। बीच में जितना विष मिले, नीलकंठ बनकर पी जाओ।"_
क्योंकि जन्म और मृत्यु के बीच जो है, वही _महाकाल की लीला_ है। और लीला का नियम एक ही है – _केवल साक्षी रहो, बंधो मत।_
- मिलन चौबे (शिक्षाविद), जबलपुर
Tags:
विविध
.jpg)