लघुकथा :
आदमीयत
दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद पैराप्लीजिक हुए, व्हीलचेयर पर जीवनयापन कर रहे, प्रौढवय नितिन जी, करीब 12 वर्षो बाद, घर से इतना दूर आये थे. दरअसल आगरा का ताजमहल उन्होंने युवावस्था में कई बार देखा था. बच्चे भी आ चुके थे। बस उनकी पत्नी ही थीं, जिन्होंने ताजमहल नहीं देखा था.
- - चलो इस बार आगरा चलते हैं. मम्मी को ताजमहल दिखा लाते हैं - जैसा कि गत कुछ वर्षों से प्रत्येक वर्ष क्रिसमस की छुट्टी में सपरिवार पिकनिक पर जाने का नितिन जी ने नियम सा बना लिया था तो उसी क्रम में इस बार आगरा जाना प्लान कर लिया.
उनकी श्रीमती चिंतित हो उठीं. ढाई-तीन सौ किलोमीटर कार में नितिन जी का बैठकर जाना फिर इतना ही आने में लगने वाले समय को लेकर वे परेशान हो रही थीं.
नितिन जी की इच्छा और बच्चों का उत्साह, श्रीमतीजी की चिंता पर भारी रहे.
नियत समय पर सब निकल गए. रास्ते में एक जगह रूककर खाना खाया और दोपहर तक आगरा पहुंच गए. ताज महल तक पहुँचने वाले रास्ते अब बदल चुके थे. बच्चों ने गूगल मैप के सहारे सही रास्ता खोज कर ताजमहल के नजदीक तक कार पहुंचवा दी. सार्वजनिक अवकाश होने की वजह से काफी भीड़-भाड़ थी. वहां तीन पुलिस वाले, जिसमें एक कुर्सी पर बैठा सब इंस्पेंक्टर था और दो कांस्टेबल, बैरीकेट लगाकर अंदर सिर्फ पैदल लोगों को जाने दे रहे थे.
जिस जगह कार रोकी गई थी, वहां से ताजमहल करीब आधा किलोमीटर दूर था. चूंकि नितिन जी को व्हीलचेयर से जाना था, इसलिए सभी लोग चिंतित हो गए.
नितिन जी के बेटे ने बैरीकेट के पास चुस्त अवस्था में खड़े सिपाही से बात की. सिपाही ने एक उड़ती सी नजर कार में बैठे लोगों पर डालकर बेमन से कार प्रवेश द्वार के पास तक ले जाने की अनुमति दे दी. साथ ही हिदायत दी कि नितिन जी को उतार कर वापस कार बैरीकेट के बाहर पार्किंग में लगा दे.
कार आगे बढ़ी तो नितिन जी ने मुस्कराकर सम्मानपूर्वक सिर थोड़ा झुका दिया. उन पर एक सरसरी नजर डालकर सिपाही फिर अपने काम में लगा गया. सब इंस्पेक्टर रौबदार भाव-भंगिमा बनाये निरपेक्ष ढंग से यह सब देखता रहा. उनके व्यवहार ने नितिन जी का मायूस कर दिया.
ताजमहल से निकलते समय धुंधलका हो गया. प्रवेश बंद हो जाने के कारण अब उतनी भीड़ भी नहीं थी। बाहर बनी दुकानों में लाइटें जल गयीं थीं.
पत्नी के चेहरे की चमक, उसके ताजमहल देखकर हो रही प्रसन्नता को बयां कर रही थी। बच्चे भी बहुत खुश थे.
ड्राईवर पार्किंग से कार लेकर बैरीकेट के अंदर आ गया. नितिन जी की पत्नी, बच्चांे सहित आगरा का प्रसिद्ध पंछी पेठा और अन्य सामान लेने चली गयी.
नितिन जी को कार में बैठा कर ड्राईवर भी पेठा खरीदने चला गया.
कार में बैठे नितिन जी घर से लाये कॉफ़ी के थर्मस से डिस्पोजल कप में कॉफ़ी निकालने लगे.
- आपको क्या हो गया, बाबूजी? - यह आवाज आते ही कॉफ़ी निकाल रहे नितिन जी ने बाहर देखा तो वही सिपाही पूछा रहा था. अब उसके भाव में रूखेपन की जगह अकल्पनीय विनम्रता थी।
नितिन जी उसे अपनी दुर्घटना के बारे में बताने लगे. सिपाही को बतियाता देख दूर खड़ा इंस्पेक्टर और दूसरा सिपाही भी पास आ गया. उनके चेहरों पर अब दोपहर वाला ताब नहीं था. इंस्पेक्टर ने अपने एक रिश्तेदार के बारे में बताया कि उसकी भी इसी तरह की दुर्घटना हो गयी थी और वह भी अब अपने पैरो पर खडे़ नहीं हो पाते.
नितिन जी ने उन्हें कॉफ़ी ऑफर की, जिसे थोड़े से संकोच के बाद उन्होंने ले लिया. उनकी डयूटी खत्म हो गयी थी. कहां से आये हैं से लेकर, घर में कौन-कौन है, तक की बातें होने लगीं.
थोड़ी देर में पत्नी-बच्चे खरीदारी करके लौट आये. पुलिस वालों को कार के पास खड़ा देख उनके चेहरे पर शिकन आ गयी थी. फिर पुलिस वालों के चेहरे पर सहज भाव देखकर सब निश्चिंत होकर कार में बैठ गये. नितिन जी ने उन पुलिस वालों से हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया तो उन्होंने गर्मजोशी से हाथ मिलाया. ड्राईवर ने कार बैक की और वहां से आगे बढ़ा. नितिन जी ने पुलिस वालों को हाथ हिलाकर विदा ली. पुलिस वाले भी मुस्कुराकर हाथ हिलाते रहे.
- कमलेश झा, झांसी
झांसी - 9450908514
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कथा कहानी
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