काव्य :
ऐ मन! ऐसे में तू लिख
नील गगन,और वृक्षों की
हो छाया और एकान्त
ऊंचे पर्वत के तले हो
एक कुटिया मेरी शान्त
बादल वहाँ तैरते हों
नित पवन झकोरों संग
पक्षियों का हो कलरव
और सभी प्रकृति के रंग
ऐ मन ऐसे में तूँ लिख
शब्दों में भर तूँ प्राण
लिख ,रोटी,कपड़ा,मकान
लिख ,निर्धन का तूँ गान
लिख तूँ ,वो हर संवेदन
जो उपजा करता है, तेरे मन
कर दर्ज ,प्रकृति का अनुकूलन
ब्रज,लिख ,असहाय का उत्पीड़न
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र , भोपाल
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