वंदेमातरम को खंडित नहीं किया जाता तो देश का विभाजन नहीं होता
वैचारिक निवेश में "वंदेमातरम" पर प्रबुद्धजन गोष्ठी हुई
मंदसौर से डॉ घनश्याम बटवाल की रिपोर्ट
मंदसौर। वंदेमातरम यह केवल एक राष्ट्रगीत ही नहीं है वरन् भारत की आत्मा के स्वर हैं। देश में वन्देमातम को लेकर श्रेय या विरोध जैसी स्थिति बनना ही नहीं चाहिए। आजादी के आंदोलन में वन्देमातरम इस राष्ट्रगीत ने घर घर में अपनी मातृभूमि के प्रति समर्पण के भाव जगाए ओर स्वाभिमान की चेतना को जागृत किया। देश को स्वतंत्रता दिलाने में बंकिमचंद्र चटर्जी द्बारा रचित यह गीत ऐसा वातावरण उत्पन्न कर गया जिससे अभिप्रेरित हो कर देशवासियों ने स्वतंत्रता संग्राम में स्वयं को झोंक दिया। यह कोई साधारण गीत नहीं हमारे देश की अस्मिता ओर प्रतिष्ठा से जुड़ा गौरव गान है। इसके अधूरे गाने जैसी बात अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।
इस आशय के विचार नगर के प्रबुद्ध जनों ने " वैचारिक निवेश संगोष्ठी" के तहत वंदे मातरम विषय पर व्यक्त किए।
वरिष्ठ अभिभाषक गोपाल कृष्ण पाटिल ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि हमारे देश में वंदे मातरम इस राष्ट्रीय गीत के संदर्भ में किसी भी तरह का विरोध विलाप या आलोचना करना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है। यह पूरा राष्ट्रगीत हमारे देश की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं भौगोलिक और सामरिक
स्थितियों का संवाहक है।
श्री पाटिल ने कहा कि कांग्रेस की स्थापना 1885 में की गई थी और देश के तत्कालीन नेताओं में इसी बैनर के तले आजादी के आंदोलन को चलाया। बंकिम बाबू ने वंदेमातरम राष्ट्रगीत लिखा यह 1930 के कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूरा गया गया वंदे मातरम अखंड भारत का प्रतीक है। इसका विरोध करना राष्ट्रीय एकता के अवसर को खोने के समान है।
सेवानिवृत न्यायाधीश रघुवीर सिंह चुंडावत ने कहा कि आजादी के आंदोलन में जब-जब भी कोई प्रसंग हुआ वंदेमातरम राष्ट्रगीत को पूरा गाया गया। कभी भी इसके शेष अंतरों को नहीं छोड़ा गया। राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम 1971 में वंदेमातरम को राष्ट्रगीत का सम्मान दिया गया। 1976 में संविधान संशोधन की धारा 51 ए के तहत राष्ट्रीय आदर्श में वंदेमातरम को जोड़ा गया है। हाल ही में नए कानून के तहत वंदेमातरम का पूरा गान नहीं गाये जाने पर 3 साल की सजा व दंड का प्रावधान है। श्री चुंडावत ने कहा कि वंदे मातरम राजनीति का विषय हो ही नहीं सकता। यह गीत तो भारत की आत्मा है।
वरिष्ठ शिक्षाविद् पूर्व प्राचार्य प्रो. रविंद्र कुमार सोहोनी ने कहा कि वन्देमातरम् भारत की स्वतंत्रता का महामंत्र है। 1875 में बंकिम चंद्र चटर्जी ने इस गीत की रचना की। 6 साल बाद उन्होंने अपनी पुस्तक "आनंदमठ"में इस पूरे गीत को उल्लेखित किया। यदि तुष्टिकरण की मानसिकता के चलते वंदे मातरम के दो अन्तरों के बाद के अंतरों को नहीं हटाया जाता तो देश का विभाजन नहीं होता। पाकिस्तान नहीं बनता। किंतु दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों के कारण वंदेमातरम को अधूरा गाया जाने लगा। श्री सोहोनी ने बताया कि राष्ट्र नियंताओं ने देश की स्वतंत्रता के खातिर वंदे मातरम को खंडित होना स्वीकार कर लिया देश तो स्वतंत्र हो गया लेकिन वे विभाजन को नहीं रोक सके।
वंदे मातरम भारत की सांस्कृतिक एकता का जीवंत संवाहक है।
वरिष्ठ समाजसेवी गुरुचरण बग्गा कहा कि जन गण मन की जगह वंदे मातरम को राष्ट्रगान होना चाहिए। विद्यालय में भी पहले वंदे मातरम गाना चाहिए। स्वतंत्रता के पूर्व जब-जब भी आजादी के आंदोलन के लिए बैठक सभा अधिवेशन होते थे तो सबसे पहले पूरा वंदे मातरम गीत गाया जाता था।भारत सरकार ने पूरे वन्देमातरम गाने के लिय जो नया कानून बनाया है राज्य सरकारों को उसे पूरी तरह क्रियान्वित करना चाहिए।
योग गुरु सुरेंद्र जैन ने कहा कि वंदेमातरम को अधूरा गाना राष्ट्र का अपमान है यदि ऐसा किया जाता है तो इसे राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में लिया जाना चाहिए। यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि भारत देश में ही वंदेमातरम के पूरा गाये जाने का विरोध किया जा रहा है जबकि इस गीत में भारत की संस्कृति परंपरा और आस्थाओं का समावेश है। किंतु राजनेतिक कारणों से
इसके केवल दो अंतरों को ही
मान्यता देना देश विरोधी मानसिकता का प्रतीक है।
जन परिषद अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार डॉ घनश्याम बटवाल ने कहा कि राज्यसभा लोकसभा में सभी जनप्रतिनिधियों को वंदे मातरम राष्ट्र गीत को पूरा स्वीकार करना चाहिए और पूरी मर्यादा और सम्मान वंदेमातरम को मिलना चाहिए। नई पीढ़ी वंदे मातरम के अर्थ और इसके महत्व को पूरा समझे। वंदे मातरम का सम्मान ही देश का वास्तविक सम्मान है ओर यह प्राथमिक शिक्षा के साथ उच्च शिक्षा तक पहुंचना चाहिए ताकि सर्व समाज जुड़ सके ।
पत्रकार एवं समाजसेवी ब्रजेश जोशी ने कहा कि कुछ विषय दलगत राजनीति तुष्टिकरण और सता की चकाचौंध से परे होने चाहिए।
स्वतंत्रता के पहले भी वंदे मातरम को पूरा गाना या इसके केवल दो अंतरों को ही गाना यह मसला उठता रहा है। यह गीत देशवासियों के मन में अपनी मातृभूमि अपनी भारत माता के प्रति श्रद्धा और समर्पण के भाव को जागृत करता है हमारी आस्था को सुदृढ़ और हमारी परंपराओं को भी पुष्ट करता है। राजनेतिक कारणों से इसका विरोध भारतीय परंपरा और संस्कृति के प्रति कदाचरण है।
शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता विक्रम भटनागर ने कहा कि विद्यालयों में आरंभ की प्रार्थना राष्ट्रगान जन गण मन से की जाती है और छुट्टी के समय राष्ट्रगीत वंदे मातरम गया जाता है। इन दोनों में यदि अंतर देखा जाए तो जन गण मन की रचना व्यक्ति विशेष के सम्मान में की गई थी वह भी ब्रिटिश से आए व्यक्ति के लिए जबकि वंदे मातरम में हमारी भारत माता का पूरा वांगमय वर्णन है जो हमारे मन ओर आत्मा को देशप्रेम से जोड़ता है। पूरे वंदेमातरम को राष्ट्रगान का सम्मान मिलना चाहिए।
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