गुरु-शिष्य की आत्मीयता ख़तरे में
गुरु-शिष्य परंपरा हमारे यहाँ सदियों से चली आ रही है। राम और कृष्ण के समय में भी गुरु-शिष्य संबंध को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था। गुरु का दर्जा माता-पिता से भी ऊपर माना गया है। लेकिन आज धीरे-धीरे गुरु-शिष्य का संबंध व्यवसायिक होता जा रहा है। न पहले जैसे गुरु रहे, न पहले जैसे शिष्य। पहले गुरु और शिष्य का रिश्ता केवल पढ़ाने और पढ़ने का रिश्ता नहीं था। उसमें अनुशासन था, लेकिन उसके भीतर स्नेह भी था; अपेक्षा थी, एक विश्वास भी था। गुरु शिष्य की केवल परीक्षा नहीं लेता था, उसके व्यक्तित्व को गढ़ता था और शिष्य केवल गुरु से विषय का ज्ञान नहीं, जीवन का विवेक भी सीखता था।
आज हमारी शिक्षा-प्रणाली में किए जा रहे बदलाव के कारण गुरु और शिष्य की इस परंपरा का ह्रास होता जा रहा है। शिक्षा के अधिकार के नाम पर पहली से आठवीं तक बच्चों को फेल नहीं किया जाता। दसवीं में भी छह में से केवल पाँच विषयों में उत्तीर्ण होना पर्याप्त है। बारहवीं में भी कई ऐसे अवसर मिल जाते हैं कि विद्यार्थी लगातार परीक्षाएँ देकर किसी न किसी तरह उत्तीर्ण हो जाए। पहले सप्लीमेंट्री परीक्षा के बाद ‘रुक जाना नहीं’ योजना का विकल्प था, लेकिन अब बारहवीं पास करने के लिए मुख्य परीक्षा, सप्लीमेंट्री (जिसे अब दूसरी परीक्षा कहा जाता है), ‘रुक जाना नहीं’ और उसके बाद ‘आ अब लौट चलें’ जैसी योजनाएँ उपलब्ध हैं।
बच्चों को दिए जा रहे ये अवसर एक ओर परीक्षा में असफल होने की संख्या कम कर रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर कहीं-न-कहीं उनकी वास्तविक शैक्षिक योग्यता पर भी प्रश्न खड़ा करते हैं। केवल कक्षा पास कर लेना शिक्षा प्राप्त कर लेना नहीं है। यदि पहली से आठवीं तक विद्यार्थी को बिना पर्याप्त ज्ञान के अगली कक्षा में भेज दिया जाएगा, तो उसकी बुनियाद तो कमजोर रह जाएगी फिर उस कमजोर नींव पर आगे की शिक्षा की मजबूत इमारत कैसे खड़ी होगी?
इसका एक उदाहरण देना चाहूँगी। एक प्रधानाचार्य ने बताया कि हमने पहली से आठवीं तक कमजोर विद्यार्थियों के लिए सप्लीमेंट्री परीक्षा शुरू की, लेकिन कई बच्चे उसमें शामिल ही नहीं होते। उनके माता-पिता का तर्क होता -
“जब आप इसे पिछली कक्षा में रोक ही नहीं सकते तो सप्लीमेंट्री देकर हमारा और अपना समय क्यों खराब करते हैं? पास तो होना ही है न! नवीं में आएगा, तब देखेंगे।”
बात केवल एक बच्चे की नहीं थी, बल्कि उस सोच की थी, जो आज हमारी शिक्षा-व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
बच्चे को असफलता से बचाना अच्छी बात है, लेकिन क्या केवल अगली कक्षा में पहुँचा देना ही शिक्षा की सफलता है? यदि बच्चा पिछली कक्षा की बुनियादी बातें सीखे बिना आगे बढ़ता चला जाए, तब उससे नवीं और दसवीं में अचानक गंभीरता से पढ़ने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? ये परीक्षाएँ विद्यार्थी के सामने बड़ी चुनौती बनकर आती हैं। आठवीं तक की कमजोर बुनियाद , दसवीं में पूरे वर्ष के पाठ्यक्रम का बोझ कैसे उठा पाएगी।परीक्षा का इस दबाव से विद्यार्थी मानसिक रूप से परेशान होने लगता है और आत्महत्या जैसे कायराना कदम उठा लेता है ।
हमें समस्या की जड़ को समझकर उसका समाधान करना चाहिए, न कि केवल परीक्षा का दबाव कम करने के लिए शिक्षा के स्तर में लगातार ढील देते जाना चाहिए।
यदि कोई बच्चा हिंदी या अंग्रेज़ी में ठीक से पढ़-लिख नहीं पाता, तो इसके लिए केवल उसे दोषी ठहराना उचित नहीं है। शिक्षक भी कई बार ऐसी व्यवस्था में स्वयं को असहाय महसूस करता है। जब विद्यार्थी को उसके वास्तविक ज्ञान के आधार पर रोका ही नहीं जा सकता, तो उसके भीतर पढ़ने की गंभीरता कम होने लगती है। दूसरी ओर विद्यार्थी भी शिक्षक के प्रति पहले जैसा सम्मान नहीं रखता। परिणामस्वरूप गुरु और शिष्य के बीच वह आत्मीयता धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है, जो कभी इस संबंध की सबसे बड़ी विशेषता हुआ करती थी।
पुरानी पीढ़ी ने भी कठिन अनुशासन में पढ़ाई की है। शिक्षक की डाँट-फटकार और कठोर अनुशासन को शिक्षा का हिस्सा माना जाता था। लेकिन आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं। शिक्षक यदि विद्यार्थी को अनुशासित करने का प्रयास करता है तो कई बार अभिभावक तत्काल हस्तक्षेप करने लगते हैं। परिणामस्वरूप शिक्षक भी सोचता है—“क्यों मुसीबत मोल लें?” इसलिए धीरे-धीरे शिक्षक और विद्यार्थी दोनों अपनी-अपनी जिम्मेदारियों तक सीमित होते जा रहे हैं। ऐसे वातावरण में आत्मीयता और सम्मान का संबंध कैसे विकसित होगा?
दूसरी ओर शिक्षा का बढ़ता व्यवसायीकरण भी चिंता का विषय है। अधिक फीस लेने वाले विद्यालय को बेहतर मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। विद्यालय का बाहरी तामझाम, सुविधाएँ और दिखावा ही शिक्षा की गुणवत्ता का पैमाना मान लिया जाता है। महंगे विद्यालय में बच्चे को पढ़ाना कई परिवारों के लिए स्टेटस सिंबल बन गया है। कुछ अभिभावकों को लगता है कि जब वे इतनी फीस दे रहे हैं, तो शिक्षक को उनके बच्चे के साथ सख्ती करने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
इसका परिणाम यह होता है कि शिक्षक और विद्यार्थी के बीच संबंध ज्ञान, अनुशासन और विश्वास पर आधारित होने के बजाय एक औपचारिक संबंध बनकर रह जाता है। शिक्षक भी कई बार केवल अपना पाठ्यक्रम पूरा करके अपनी जिम्मेदारी समाप्त समझ लेता है और विद्यार्थी भी शिक्षा को केवल परीक्षा पास करने का माध्यम मानने लगता है।
इस स्थिति में हमें शिक्षा-प्रणाली पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल अधिक से अधिक बच्चों को अगली कक्षा में पहुँचाना या साक्षरता का आँकड़ा बढ़ाना नहीं होना चाहिए। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य ज्ञान, विवेक, अनुशासन, संस्कार और जिम्मेदारी का विकास करना है।
यदि हम अपनी शिक्षा-प्रणाली में ऐसे परिवर्तन लाएँ, जिनमें विद्यार्थी की वास्तविक समझ और ज्ञान को महत्व मिले तथा शिक्षक को सम्मान और स्वतंत्रता के साथ अपनी भूमिका निभाने का अवसर मिले, तो गुरु-शिष्य संबंध में खोती हुई आत्मीयता को फिर से स्थापित किया जा सकता है। आखिर शिक्षा केवल पुस्तकों और परीक्षाओं का नाम नहीं है; शिक्षा वह प्रक्रिया है जो एक विद्यार्थी को बेहतर मनुष्य बनाती है।
समय बदला, शिक्षा बदली, विद्यालय बदले और गुरु-शिष्य के संबंधों का स्वरूप भी बदल गया। आज शिक्षा के साधन पहले से कहीं अधिक हैं, लेकिन क्या शिक्षा का उद्देश्य भी उतना ही स्पष्ट है? क्या हम अपने बच्चों को केवल अगली कक्षा और अगली परीक्षा के लिए तैयार कर रहे हैं, या उन्हें एक बेहतर मनुष्य बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ा रहे हैं?
यही प्रश्न आज हमारी शिक्षा-व्यवस्था और गुरु-शिष्य संबंध, दोनों के सामने खड़ा है।
- मधूलिका श्रीवास्तव , भोपाल
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