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काव्य : तुम मेरे होने की सबसे ख़ूबसूरत वजह हो…-नीलम द्विवेदी, रायपुर



काव्य : 

तुम मेरे होने की सबसे ख़ूबसूरत वजह हो…

तुम वो शख़्स हो,
जो मेरी हर ख़ुशी का ख़याल
मेरी कही बातों से नहीं,
मेरी ख़ामोशियों को समझ के रखते हो।
मैं कुछ कहूँ या न कहूँ,
तुम मेरे दिल की अनकही दास्तान
बिना किसी अल्फ़ाज़ के पढ़ लेते हो।

मेरी ख़ामोशी में भी
तुम मेरी आवाज़ सुन लेते हो,
मेरी आँखों में ठहरी उदासी को
मेरी मुस्कान से पहले पहचान लेते हो।
मैं रूठ भी जाऊँ तो
तुम्हारे स्नेह में कोई शिकवा नहीं होता,
तुम्हारा अपनापन कभी
मेरी नाराज़गी से कम नहीं होता।

तुम मेरे लिए ठहरते हो,
मेरी राहों में प्रतीक्षा बनकर रहते हो,
मेरी एक छोटी-सी मुस्कान के लिए
न जाने कितनी दुआएँ, कितने जतन करते हो।
मेरी ख़ुशियों को अपनी ख़ुशियों से पहले रखना—
शायद यही तुम्हारे प्रेम की सबसे सुंदर भाषा है।

तुम्हारे मेरी ज़िंदगी में आने से
जैसे बहारों ने फिर मेरा पता पूछ लिया,
जैसे सूने आँगन में
हज़ारों उजालों ने अपना घर बना लिया।
जो आँखें कभी उदासी की परछाइयों में रहती थीं,
उनमें फिर से
उम्मीद की रोशनी और ख़्वाबों की चमक उतर आई।

मेरे लिए तुमने
ख़ुद को बदलना भी सीख लिया,
मेरी ख़ामियों को स्वीकार कर
मेरे अधूरेपन को अपना लिया।
मेरे भीतर पसरे उस सूनेपन को
तुमने अपने स्नेह से इस तरह भर दिया,
कि अब तन्हाई भी
तुम्हारी यादों के साथ खूबसूरत लगती है।

तुम मुझे ख़ास होने का एहसास कराते हो,
मेरी फीकी सुबहों में रंग भर जाते हो,
जब मेरा मन उदासी की गहराइयों में उतरता है,
तुम अपनी बातों से
मेरे भीतर फिर से उजाला कर जाते हो।

तुम्हारे दिल में मेरे लिए
जो मोहब्बत है,
उसे शब्दों की सीमा में बाँधना
शायद मेरे बस की बात नहीं।
तुम्हारी सादगी, तुम्हारा अपनापन,
तुम्हारी बेपनाह परवाह—
मेरी हर दुआ के बीच
तुम्हारा नाम लिख जाती है।

तुम्हारी दुनिया शायद
मेरी मुस्कान में सिमट जाती है,
और मेरी दुनिया में भी
तुम्हारी मौजूदगी से रौनक आती है।
तुम पास होते हो तो
ज़िंदगी महज़ गुज़रती नहीं,
कुछ पल ठहरकर
जीने का हुनर सिखाती है।

तुम मेरे लिए सिर्फ़ एक शख़्स नहीं,
मेरी मुस्कान का सबब हो,
मेरे सूनेपन की रौनक हो,
मेरी बेचैनियों का सुकून हो,
मेरी दुआओं का सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा हो,
और शायद…
मेरे होने की सबसे ख़ूबसूरत वजह हो।

बस इतना-सा कहना है तुमसे—
मेरे साथ यूँ ही बने रहना,
मेरी ख़ुशियों में अपनी हँसी मिलाते रहना,
मेरी उदासियों में मेरा हाथ थामे रहना।
वक़्त चाहे जितने रंग बदले,
ज़िंदगी चाहे कितने मोड़ ले,
तुम मेरे साथ
यूँ ही कदम से कदम मिलाकर चलना—
ज़िंदगी के आख़िरी मोड़ तक,
मेरे हमसफ़र बनकर।

मुझे ये दुनिया
थोड़ी और हसीन लगती है
जब तुम मेरे पास होते हो।
तुम मेरे लिए
उगते हुए सूरज की पहली किरण जैसे हो,
अँधेरी रात में टिमटिमाते
किसी उम्मीद के सितारे जैसे हो।
तुम्हारे होने से
ज़िंदगी में सिर्फ़ ख़ुशियाँ नहीं आईं,
बल्कि जीने की एक नई वजह मिली है।

तुम मेरे लिए मोहब्बत से भी बढ़कर हो—
मेरे दिल का सुकून,
मेरी रूह की रौशनी,
मेरी मुस्कान की वजह,
और मेरे जीवन की
सबसे ख़ूबसूरत दास्तान हो। 

 - नीलम द्विवेदी
रायपुर छत्तीसगढ़।
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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