ad

गिरि पर सकल करहिं अनुरागा - देवेन्द्र कुमार रावत , भोपाल


गिरि पर सकल करहिं अनुरागा

   -  देवेन्द्र कुमार रावत , भोपाल


    श्री रामचरितमानस में पर्वतों से  सभी प्रेम करते थे । यह कथा बालकांड में पर्वतराज हिमाचल के यहाँ उमा जी के अवतरण प्रसंग  में आयी है वर्णन आता है :-

  सहज बयरु सब  जीवन त्यागा  गिरि  पर सकल करहिं  अनुरागा

अर्थात जब से उमा जी का अवतरण हिमाचल के यहां हुआ तब से सब जीवों ने अपना स्वाभाविक बैर छोड़ दिया और पर्वतों से  सभी प्रेम करते हैं यहां उमाजी अर्थात पार्वती जी का एक और आध्यात्मिक स्वरूप का  नाम श्रद्धा है और भगवान शिव साक्षात् विश्वाश है ।  इसी श्रद्धा के कारण हम कण –कण  में ईश्वरीय सत्ता  का विश्वास करते हैं । जब जीवों के हृदय में सात्विक श्रद्धा का प्रवाह उत्पन्न होता है ,तब जीव को अपने सहज स्वरूप का बोध  होने से सबके प्रति प्रेम उत्पन्न  हो जाता है । यही आध्यात्मिक अनुभव उमा  जी के जन्म समय के बाद प्राणी मात्र  को हुआ ।  किंतु यह अतीत की कथा है पर इसमें स्पष्ट होता है कि ह्रदय में आज भी पर्वतों के प्रति हमारे हृदय में श्रद्धा होने से पर्वतो के प्रति जो  प्रेम होगा तो उसका  लाभ संपूर्ण प्राणी मात्र को मिल सकता है , किन्तु पर्वतों के प्रति हमारी भावना पवित्र होनी चाहिए कि  वे हमारे कल्याण के  हेतु है ,भोग के लिए नहीं है  भगवान श्री कृष्ण ने इसलिए ही श्रीमद् भागवत गीता में हम सभी का ध्यान आकर्षित किया है वर्णन आता है:-

यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः

                       अर्थात समस्त यज्ञो में पवित्र नाम का कीर्तन जप  तथा अचलों  में , मैं हिमालय हूं तो जो पर्वत स्वयं प्रभु का ही स्वरुप है वहाँ  हमारी श्रद्धा का स्वरूप सात्विक ही होना चाहिए , किंतु इसके विपरीत  हमने वहां अपनी अध्यात्म ज्ञान के अभाव में पश्चिमी प्रभाव में आकर भोग विलास हेतु विश्रामालयो की रचना कर डाली है ।  हम  यह भी भूल गए कि  पर्वत नदियों के  उद्गम स्थल होते हैं ,तो जहां हमारी नदियां उद्गम स्थलों पर ही हमने अपवित्र कर दी हैं ,तो वह कैसे आगे  पवित्र बनी रह सकती हैं इन्हें पवित्र बनाये रखना हमारे  शासकों  के कर्तव्यों में भी आता है ।  इस संदर्भ में मानस में भी वर्णन आया है कि :-              

                      जब  तें  उमा  सैल  गृह  जाईं ।  सकल सिद्धि संपति तहँ छाईं ॥ 

                      जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे । उचित बास हिम भूधर दीन्ह                                 

                      अर्थात पर्वतीय क्षेत्र तथा नदियों के उभय तटों  पर मुनियों ने सुंदर आश्रम बना लिए और राजा हिमाचल ने उन सभी मुनियों को उचित स्थान दिये  यही कारण था , कि तब इन क्षेत्रो में सात्विक प्रभाव से समस्त प्राणी मात्र सुखी रहते थे इस संदर्भ में महर्षि वाल्मीकि आश्रम की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन आया है:-

                                देखत बन सर सैल सुहाए । बालमीकि आश्रम प्रभु आए ॥

                    राम   दीख   मुनि   बासु   सुहावन । सुंदर   गिरि  काननु  जलु  पावन ।। 

                          सरनि सरोज बिटप बन फूले । गुंजत मंजु मधुप रस भूले ॥

                     खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं । बिरहित बैर मुदित मन चरहीं ॥

            अर्थात सुंदर वन तालाब और पर्वत देखते हुए प्रभु श्री रामचंद्र जी वाल्मीकि के आश्रम में आए रामचंद्र जी ने देखा कि मुनि का  निवास स्थान बहुत सुंदर है ।  जहां सुंदर पर्वत वन  और पवित्र जल है ।  सरोवरों में कमल और वनों में वृक्ष फूल रहे हैं ।  और मकरंद में मस्त हुए भौरे  सुंदर गुंजार   कर रहे हैं ।  बहुत से पक्षी और पशु कोलाहल कर रहे हैं ,और बैर  से रहित  होकर प्रसन्न मन से विचर रहे ऐसे आश्रम को देखकर श्री राम जी को प्रसन्नता हुई वर्णन आया है :-

       सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन । सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन ॥

            अर्थात पवित्र सुंदर आश्रम को देखकर श्री राम जी हर्षित हुए इस कथा प्रसंग की द्रष्टि से वर्तमान में  पर्वतीय तथा नदियों के उभय तटो को देखें तो  वनों की कटाई और जैव विविधता की हानि के कारण ही हमारा पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित हुआ है ।  जिसके कारण ही अति वर्षा से बाढ़ , भूस्खलन ,  पर्वतीय स्थलों पर भारी विनाश लीला को हम प्रत्यक्ष देख भी रहे हैं  ।  यदि हम अभी सावधान नहीं हुये  तो ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर पिघल जाएंगे और तटीय  तथा मैदानी क्षेत्रों में जल प्रलय की तबाही भी देखने को मिलेगी हमें अब यह ज्ञान होना चाहिए  , कि पर्वतों पर इतना हिम  जमा है जो पृथ्वी को पानी- पानी कर सकता है । अतः प्रकृति के प्रति हमें श्रद्धा इसलिए भी रखनी चाहिए कि यही  हिम पिघलकर  ग्रीष्म काल में हमारी नदियों के जल का अगाध स्रोत होता है । , तो जो प्रकृति हमारे लिए  तापमान का  इतना संतुलन बनाए रखे हुए है , तो  हमारे जीवन शैली भी ऐसी ही संतुलित होनी चाहिए कि हम उसके तापमान में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न न करें अन्यथा इसकी दुष्परिणाम भयंकर रूप से सामने आएंगे भगवान श्री कृष्ण श्रीमद् भागवत में गोवर्धन धारण प्रसंग के अंतर्गत यही चेतावनी देते हुए कहते हैं :-

एषोऽवजानतो मर्त्यान् कामरूपी वनौकसः । हन्ति ह्यस्मै नमस्यामः शर्मणे आत्मनो गवाम

       अर्थात जो इन पर्वतों का निरादर करते हैं ,उन्हें यह नष्ट कर डालते हैं इसके विपरीत यदि हमारी श्रद्धा के केंद्र में यह पर्वत रहते हैं तो न  इनसे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष होने वाले लाभों से संपूर्ण जड़ चेतन सुखी होता है  । यही कारण है कि गोवर्धन धारण प्रसंग में भगवान श्री  कृष्ण से जब श्रीमद्भागवत में पिता श्री नंद बाबा ने यह कहा :-

पर्जन्यो भगवानिन्द्रो मेघास्तस्यात्ममूर्तयः । तेऽभिवर्षन्ति भूतानां प्रीणनं जीवनं पयः ॥

     अर्थात नंद बाबा ने कहा बेटा भगवान इंद्र वर्षा करने वाले मेघो  के स्वामी है यह मेघ उन्हीं के अपने रूप है ।  वे समस्त प्राणियों को तृप्त  करने वाला एवं जीवनदान करने वाला जल बरसाते  हैं । तब भगवान श्री कृष्ण ने नंद बाबा से वर्षा होने के संदर्भ में जो वैज्ञानिक व्याख्या की है , वह वर्तमान में पर्यावरण की दृष्टि से बहुत प्रासंगिक है वे कहते हैं:-

        कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते । सुखं दुःखं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते ॥

     अर्थात हे  पिताजी प्राणी अपने कर्म अनुसार पैदा होता है और कर्म  से ही मर जाता है उसे उसके कर्म के अनुसार ही सुख-दुख भय  और मंगल के निमित्तों  की  प्राप्ति होती है इसलिए जब सभी प्राणी अपने-अपने कर्मों का फल भोग रहे हैं :-

किमिन्द्रेणेह भूतानां स्वस्वकर्मानुवर्तिनाम् । अनीशेनान्यथा कर्तुं स्वभावविहितं नृणाम् ॥

      अर्थात हमें इंद्र की तब क्या आवश्कता हो सकती है ,हे पिताजी पूर्व संस्कार बस मनुष्य के कर्म फल को जब बे बदल ही नहीं सकते हैं । तो उनसे क्या प्रयोजन ,यहाँ  भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट करते हैं , कि यह जानकर तो वर्तमान में ही सही हम अपने कर्म भगवान गोवर्धन की कृपा से सुधार सकते हैं ।  साथ ही हमारे  जीवन में अध्यात्म और विज्ञान का   समन्वय हो जाने से  यह बात भी  समझ में आ जाती है , कि किसी भी क्षेत्र में वर्षा पर्वतों के ही कारण होती है ।  भूगोल वेत्ता भी यही  कहते हैं  कि , जब पृथ्वी से उठने वाली वाष्प भरी संवाहनिक  धाराएं इन पर्वतो से  टकराती है , तो वर्षा कर देती हैं दूसरे जीवन शैली के संतुलन से ही तापमान का संतुलन बना रहता है ।  जिस के कारण न तो अति वर्षा होती है न अल्प , यही कारण है कि “ राम राज्य में माँगे  बारिध  देई  जल रामचंद्र के राज  ”अर्थात जितनी आवश्यकता होती थी उतनी ही वर्षा होती थी।  इससे स्पष्ट है कि पर्वतों पर अनुराग प्रसंग को धार्मिक दृष्टि से ही नहीं वैज्ञानिक दृष्टि से भी समझने का ज्ञान परम आवश्यक है  ।  मानस भी यही कहती है ,कि

“बिनु विज्ञान कि समता आवइ ”

        अर्थात विज्ञान( तत्वज्ञान) के बिना क्या समभाव आ सकता है ,तो ये  तत्वज्ञान त्रेतायुग में इन पर्वतों पर ऋषि मुनियों के आश्रमों में ही मिलता था ।  जिसके माया-मोह दूर हो जाते थे इसे आज के संदर्भ में देखे तो यह माया ही हम मनुष्य को इतनी भ्रमित कर रही है , कि हम स्वयं  के विनाश के लिए भस्मासुर बनने को तैयार बैठे हैं ।   हमारा मोह  (अज्ञान) हमें यह सब समझने के लिए रोक रहा है ,जबकि पर्वतीय भागों में तपस्यारत  तपस्वियों के तप के  प्रभाव से यह दोनों समूल  नष्ट हो जाया करते थे वर्णन आया है कि :-              

                     गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा । मति अकुंठ हरि भगति अखंडा ।। 

                          देखि   सैल   प्रसन्न  मन  भयऊ । माया मोह सोच सब गयऊ ॥

          अर्थात गरुड़ जी को नीलांचल पर्वत को देखकर ही मन प्रसन्न हो गया और उसके दर्शन से ही सब माया मोह तथा सोच जाता रहा । 

     अतः स्पष्ट है कि पर्वत तप  के लिए हैं भोगों के लिए नहीं ।  पर्वतीय भागों में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए हमारी सनातन संस्कृति की इस संयम रेखा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए अन्यथा भारी विनाश से सब कुछ नष्ट हो सकता है । 


                 



देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post