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∆ जरा बच के ----- हां : डिजिटल मृगतृष्णा के पीछे का सच: एक वायरल फोटो ट्रेंड की छिपी हुई कीमत - विजय प्रकाश पारीक ,मन्दसौर


∆ जरा बच के ----- हां :

डिजिटल मृगतृष्णा के पीछे का सच: एक वायरल फोटो ट्रेंड की छिपी हुई कीमत

 - विजय प्रकाश पारीक 
स्तंभकार एवं समाज शास्त्री 

प्रस्तुति डॉ घनश्याम बटवाल मंदसौर 

      आजकल सोशल मीडिया की टाइमलाइन खोलते ही एक अजीब सी जादुई दुनिया नजर आती है। हर तरफ 1980 के दशक की यादें बिखरी पड़ी हैं—बड़े-बड़े बाल, विंटेज कपड़े, फिल्मी रोशनी, अनालॉग फिल्म का ग्रेन और वो पुरानी स्टूडियो वाली मुद्रा। आम लोग, सेलिब्रिटीज, दोस्त-रिश्तेदार नेता - अभिनेता—सभी अपनी वर्तमान सेल्फी को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस AI की छड़ी से “अस्सी के दशक” में तब्दील कर रहे हैं। कुछ सेकंड में तस्वीर तैयार हो जाती है, लाइक्स बरसते हैं, कमेंट्स में “वाऊ” और “पुरानी यादें ताजा हो गईं” लिखा आता है। यह ट्रेंड रोमांचक लगता है, मनोरंजक लगता है, और पल भर के लिए हम खुद को उस सुनहरे अतीत का हिस्सा महसूस करते हैं।
लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक गंभीर सवाल छिपा है। यह केवल एक फिल्टर या खेल नहीं है। यह एक डिजिटल मृगतृष्णा है—एक ऐसी चमक जो दूर से पानी लगती है, लेकिन पास जाने पर रेत निकलती है। जब हम इस ट्रेंड के असली खर्च को खंगालते हैं, तो दो बड़े नुकसान सामने आते हैं: हमारी व्यक्तिगत निजता का स्थायी नुकसान और पर्यावरण पर पड़ने वाला अदृश्य लेकिन वास्तविक बोझ। 
यह लेख इन्हीं दो सच्चाइयों को खोलने, उन पर गहराई से सोचने और फिर जिम्मेदार चुनाव की प्रेरणा देने का प्रयास है।

*चेहरे का सौदा और निजता की कीमत जो कभी वापस नहीं आती*

जब कोई व्यक्ति किसी AI टूल—चाहे वह ChatGPT हो, Gemini हो या कोई अन्य ऐप—पर अपनी साफ-सुथरी तस्वीर अपलोड करता है और प्रॉम्प्ट लिखता है कि “मुझे 1980 के दशक के स्टाइल में बना दो”, तो वह केवल एक फोटो नहीं भेज रहा होता। वह अपने चेहरे के बायोमेट्रिक फीचर्स सौंप रहा होता है। चेहरे की ज्यामिति, आंखों की दूरी, त्वचा की बनावट, मुस्कान का कोण—ये सब अद्वितीय पहचान हैं। पासवर्ड बदला जा सकता है, लेकिन चेहरा नहीं।
कई कंपनियों की शर्तों में साफ लिखा होता है कि यूजर द्वारा अपलोड किया गया कंटेंट मॉडल को बेहतर बनाने के लिए इस्तेमाल हो सकता है, जब तक कि यूजर खुद ऑप्ट-आउट न करे। ज्यादातर लोग इन शर्तों को पढ़ते ही नहीं। नतीजा यह होता है कि आपकी तस्वीर कुछ दिनों में सोशल मीडिया फीड से गायब हो सकती है, लेकिन कंपनी के सर्वर में वह डेटा लंबे समय तक रह सकता है। भविष्य में इसका इस्तेमाल मॉडल ट्रेनिंग, फेशियल रिकग्निशन सिस्टम या अन्य व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए हो सकता है। निजता विशेषज्ञ बार-बार चेतावनी देते हैं कि बायोमेट्रिक डेटा का लीक होना या गलत हाथों में जाना पहचान चोरी, निगरानी या गलत पहचान जैसे जोखिम पैदा कर सकता है।

यह केवल व्यक्तिगत जोखिम नहीं है। जब करोड़ों लोग एक ही ट्रेंड में शामिल होते हैं, तो सामूहिक रूप से एक विशाल चेहरे का डाटाबेस बन जाता है। हम मनोरंजन के नाम पर अपनी सबसे संवेदनशील पहचान को “फ्री” सेवा के बदले में दे रहे हैं। असली कीमत यह है कि हम अपनी डिजिटल स्वतंत्रता का एक टुकड़ा हमेशा के लिए सौंप देते हैं।

*पर्यावरण नुकसानी का चुपचाप चुका रहे हैं बिल*

दूसरा और उससे भी ज्यादा व्यापक नुकसान पर्यावरण का है। लोग सोचते हैं कि स्क्रीन पर एक टच से तस्वीर बन गई, तो नुकसान क्या? हकीकत यह है कि हर AI इमेज के पीछे विशाल डेटा सेंटरों में भारी कंप्यूटिंग पावर चल रही होती है। सर्वर गर्म होते हैं, उन्हें ठंडा रखने के लिए बिजली और पानी दोनों की जरूरत पड़ती है।

हाल के अध्ययनों और अनुमानों के मुताबिक, एक सामान्य गुणवत्ता वाली AI इमेज बनाने में लगभग 1 से 5 वाट-घंटे (Wh) ऊर्जा लग सकती है। उच्च गुणवत्ता या ज्यादा जटिल मॉडल में यह 10 Wh तक पहुंच सकती है। तुलना के लिए, एक सामान्य स्मार्टफोन को पूरी तरह चार्ज करने में करीब 10-15 Wh ऊर्जा लगती है। यानी एक अच्छी AI फोटो कभी-कभी एक फोन चार्ज के बराबर या उसके एक बड़े हिस्से जितनी ऊर्जा ले लेती है। पानी की खपत भी छोटी नहीं है। अनुमानों के अनुसार, एक इमेज के लिए सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से 15 से 60 मिलीलीटर पानी खर्च हो सकता है—कुछ रिपोर्ट्स में औसत आंकड़ा करीब 28-29 मिलीलीटर बताया गया है। यह थोड़ा लगता है, लेकिन जब लाखों-करोड़ों लोग एक ही ट्रेंड में कई-कई वर्जन बनाते हैं, तो कुल खपत चौंकाने वाली हो जाती है।
डेटा सेंटरों की वैश्विक बिजली खपत पहले से ही सैकड़ों टेरावाट-घंटे में पहुंच चुकी है और AI के कारण यह तेजी से बढ़ रही है। अनुमान है कि 2030 तक यह लगभग दोगुनी हो सकती है। पानी की कमी वाले क्षेत्रों में ये सेंटर स्थानीय संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं। एक वायरल ट्रेंड में अगर करोड़ों इमेज बनें, तो ऊर्जा और पानी का कुल उपयोग एक छोटे शहर या हजारों घरों की दैनिक जरूरत के बराबर पहुंच सकता है। हम एक ऐसी तस्वीर के लिए संसाधन खर्च कर रहे हैं जिसे ज्यादातर लोग एक हफ्ते बाद भूल ही जाना है ।

यह स्थिति हमें गहरे आत्ममंथन की तरफ ले जाती है। क्या हम केवल वर्चुअल वाहवाही और FOMO (फियर ऑफ मिसिंग आउट) के लिए असली पानी और बिजली स्वाहा करने को तैयार हैं? क्या डिजिटल मनोरंजन की कीमत धरती के संसाधनों से चुकाई जानी चाहिए?

*डिजिटल मृगतृष्णा और असली यादों का अंतर*

यह ट्रेंड हमें एक बड़ी सच्चाई याद दिलाता है। हम अतीत की खोज में हैं, लेकिन असली अतीत को नहीं, बल्कि उसके कृत्रिम पुनर्निर्माण को। 1980 का दशक केवल बालों और कपड़ों का नहीं था। वह परिवार के साथ बिताए गए समय, सीमित संसाधनों में खुशी खोजने, असली कैमरे से खींची गई तस्वीरों में कैद मुस्कान और यादों का दौर था। AI हमें वह लुक दे सकता है, लेकिन वह भावना नहीं दे सकता। वह प्रामाणिकता नहीं दे सकता जो पुरानी एलबम में धूल भरी तस्वीरों में छिपी होती है।

जब हम बार-बार नए ट्रेंड अपनाते हैं—कभी Ghibli स्टाइल, कभी एक्शन फिगर, कभी 80s पोर्ट्रेट—तो हम एक चक्र में फंस जाते हैं। हर नया फिल्टर थोड़ी देर की खुशी देता है, फिर फीका पड़ जाता है। असली संतुष्टि कहीं और छिपी है। अपने माता-पिता की पुरानी तस्वीरें निकालना, उनके कपड़े पहनकर आईने के सामने खड़े होना, परिवार के साथ असली कैमरा लेकर पोज देना—इनमें जो सुकून और जुड़ाव है, वह किसी भी AI इमेज से कहीं ज्यादा गहरा है।

यह समय चयन का है निराशा का नहीं, बल्कि जागरूकता और प्रेरणा का है। तकनीक बुरी नहीं है। 
AI चिकित्सा, शिक्षा, अनुसंधान और कई क्षेत्रों में क्रांतिकारी काम कर रहा है। समस्या तब पैदा होती है जब हम बिना सोचे-समझे उसका इस्तेमाल सिर्फ मनोरंजन और दिखावे के लिए करते हैं।
अगली बार जब कोई नया ट्रेंड आए और आपका चेहरा मांगे, तो एक पल रुकें। पूछें—क्या यह जरूरी है? क्या मैं अपनी निजता दे रहा हूं? क्या मैं संसाधनों का अनावश्यक दोहन कर रहा हूं? अगर जवाब हां में है, तो विकल्प चुनें। घर की अलमारी खोलें। पुराने कपड़े निकालें। असली रोशनी में खड़े हों। परिवार के साथ हंसें और कैप्चर करें। उस तस्वीर में जो सच्चाई और याद होगी, वह कभी फीकी नहीं पड़ेगी।

हम डिजिटल युग में जी रहे हैं, लेकिन हमारी जड़ें अभी भी इसी धरती पर हैं। पानी, बिजली, हवा और निजता—ये संसाधन सीमित हैं। हर जिम्मेदार पसंद, चाहे वह छोटी क्यों न हो, एक योगदान है। तकनीक को अपने जीवन का मालिक नहीं, बल्कि सहायक बनाएं। समझदारी से इस्तेमाल करें, केवल इसलिए नहीं कि “सब कर रहे हैं” ?

जरूर डिजिटल मृगतृष्णा आकर्षक है, लेकिन असली जीवन और असली यादें उससे कहीं ज्यादा कीमती हैं। अगली बार जब फीड पर 80s वाली तस्वीर आए, तो मुस्कुराएं, लेकिन क्लिक करने से पहले सोचें। आपकी एक छोटी सी सोच इस खूबसूरत धरती और आपकी अपनी निजता दोनों को बचा सकती है। यही सच्ची प्रेरणा है—न कि ट्रेंड का हिस्सा बनना, बल्कि सोच-समझकर अपना रास्ता चुनना। 
ध्यान रखना अपना, भावों या ट्रेंड के बीच अपने मूल अस्तित्व को बचा रखना।
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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