लंदन डायरी :
ब्रिटेन की विद्युत व्यवस्था : बिजली के तारों से बिल भुगतान तक
लंदन में रहते हुए रोज ऐसी कई चीजें दिखाई देती हैं, जिनके पीछे की व्यवस्था जानने की उत्सुकता सभी की होती है। लाल बसें कैसे चलती हैं, भूमिगत रेल कैसे संचालित होती है, पीने योग्य स्वच्छ पानी हमारे घर तक कैसे पहुंचता है और बिजली आखिर आती कहां से है?
बिजली के सवाल पर मेरी जिज्ञासा शायद कुछ अधिक स्वाभाविक है। विद्युत वितरण कंपनी में लगभग चार दशक काम करने और मुख्य अभियंता के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद बिजली मेरे लिए केवल स्विच दबाते ही मिलने वाली सुविधा भर नहीं है। उसके पीछे बिजलीघर, ग्रिड, ट्रांसफॉर्मर, सबस्टेशन, तार, मीटर, बिलिंग, राजस्व वसूली और हजारों कर्मचारियों की एक पूरी दुनिया दिखाई देती है।
शायद इसी कारण लंदन की विद्युत व्यवस्था को देखते हुए मुझे अपने कार्यजीवन की भी याद आती है।
हमारे समय में आज के बच्चों की तरह नौकरी बदलना बहुत सामान्य नहीं था। मैंने विद्युत मंडल में ही नौकरी शुरू की और वहीं अपनी पूरी सेवा बेदाग पूरी करके सेवानिवृत्त हुआ। इसलिए विद्युत मंडल मेरे लिए केवल एक संस्था नहीं रहा, वह मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
आज भी यदि किसी चौराहे पर कोई विद्युत मंडल के बारे में नकारात्मक बात करता सुनाई दे जाए तो मुझे व्यक्तिगत रूप से पीड़ा होती है। यह नहीं कि व्यवस्था में कमियां नहीं थीं या उपभोक्ताओं की शिकायतें नहीं थीं। थीं, और उन्हें दूर करना भी हमारी जिम्मेदारी थी। लेकिन उस व्यवस्था को चलाने वाले हजारों कर्मचारियों की 24*7 मेहनत को एक ही झटके में खारिज कर देना मुझे उचित नहीं लगता।
मैं अपने लाइन कर्मचारियों से हमेशा कहता था कि वे केवल बिजली के तार ठीक करने वाले कर्मचारी नहीं हैं, वे कंपनी के ब्रांड एम्बेसडर हैं। उपभोक्ता के घर फॉल्ट होने पर सबसे पहले कोई मुख्य अभियंता या महाप्रबंधक नहीं पहुंचता। गर्मी, बारिश या रात के अंधेरे में खंभे पर चढ़कर तार ठीक करने वाला लाइन कर्मचारी ही उपभोक्ता के लिए बिजली विभाग का चेहरा होता है।
उसका व्यवहार और उसकी तत्परता ही उपभोक्ता के मन में पूरी कंपनी की छवि बनाती है।
इसी नजर से जब लंदन की बिजली व्यवस्था को देखता हूं तो सवाल केवल यह नहीं होता कि यहां कितनी बिजली पैदा होती है। मन यह भी पूछता है कि उपभोक्ता, कंपनी और कर्मचारी के बीच संबंध कैसे बनाए गए हैं।
भारत और ब्रिटेन की विद्युत व्यवस्था की तुलना करते समय सबसे पहले उनके आकार का अंतर समझना जरूरी है।
ब्रिटेन की कुल स्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता लगभग 120 गीगावाट है, जबकि भारत की क्षमता जून 2026 तक लगभग 549 गीगावाट पहुंच चुकी थी। यानी भारत की स्थापित उत्पादन क्षमता ब्रिटेन से करीब पांच गुना है।
यह अंतर स्वाभाविक भी है। भारत की आबादी और भौगोलिक विस्तार बहुत बड़ा है तथा बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। ब्रिटेन छोटा देश है, लेकिन उसकी चुनौती अब दूसरी है, पुराने नेटवर्क को आधुनिक बनाना, पवन और सौर जैसी बदलती इंस्टेंट ऊर्जा को ग्रिड में समाहित करना और साथ ही उपभोक्ता के लिए बिजली को भरोसेमंद तथा वहनीय बनाए रखना।
लंदन के घर में जलने वाला बल्ब किसी एक बिजलीघर से सीधे बिजली नहीं पाता, भारत की ही तरह। बिजली पहले उत्पादन केंद्रों में बनती है। वहां से उच्च वोल्टेज ट्रांसमिशन नेटवर्क के जरिए स्थानीय वितरण नेटवर्क से होकर घरों और दुकानों तक पहुंचती है।
ग्रेट ब्रिटेन में नेशनल एनर्जी सिस्टम ऑपरेटर, एनईएसओ, पूरे सिस्टम में बिजली की मांग और आपूर्ति का संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह स्वयं बिजली बेचने वाला संस्थान नहीं है, बल्कि पूरे विद्युत तंत्र का संतुलन बनाए रखने वाला संचालक है।
ब्रिटेन की बिजली व्यवस्था तेजी से बदल रही है। 2025 में ग्रेट ब्रिटेन की बिजली उत्पादन में पवन ऊर्जा की हिस्सेदारी लगभग 29.7 प्रतिशत थी और गैस की लगभग 26.8 प्रतिशत। वर्ष भर में लगभग 63 प्रतिशत बिजली नवीकरणीय स्रोतों से मिली।
भारत में अभी तस्वीर अलग है। यहां नवीकरणीय ऊर्जा की स्थापित क्षमता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन वास्तविक बिजली उत्पादन में ताप विद्युत, विशेषकर कोयले की भूमिका अभी भी बहुत बड़ी है।
आगे की कहानी दिलचस्प है। यह भारत की वर्तमान स्थिति से थोड़ा भिन्न भी है।
जिस कंपनी को आप बिजली का बिल देते हैं, जरूरी नहीं कि उसी कंपनी के तार आपके घर तक बिजली पहुंचा रहे हों।
लंदन का स्थानीय बिजली वितरण नेटवर्क यूके पावर नेटवर्क्स के पास है। यही संस्था लंदन और दक्षिण पूर्व इंग्लैंड के बड़े हिस्से में बिजली के तारों, केबलों और सबस्टेशनों के नेटवर्क को संभालती है।
ब्रिटेन में बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन, वितरण और बिजली बेचने की जिम्मेदारियां अलग-अलग संस्थाओं में बंटी हुई हैं।
भारत में आम उपभोक्ता के लिए यह व्यवस्था अपेक्षाकृत अलग रही है। यहां जिस डिस्कॉम को हम बिजली का बिल देते हैं, उसी को सामान्यतः बिजली देने वाली और हमारी शिकायत सुनने वाली संस्था के रूप में जानते हैं।
लंदन में यदि आपके घर बिजली नहीं आ रही तो बिल वाली कंपनी को फोन करना और नेटवर्क की खराबी के लिए सही संस्था तक पहुंचना दो अलग बातें हो सकती हैं।
यह निजीकरण कब हुआ?
ब्रिटेन की बिजली व्यवस्था का बड़ा परिवर्तन 1990 के दशक की शुरुआत में हुआ। 1989 के इलेक्ट्रिसिटी एक्ट ने निजीकरण का रास्ता बनाया और 1990 में नई व्यवस्था लागू हुई। हमारे यहां यह परिवर्तन अभी भी धीरे से जारी है।
यहां पुराने क्षेत्रीय बिजली बोर्डों को कंपनियों में बदला गया। लंदन इलेक्ट्रिसिटी भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा थी।
उस समय सोच यह थी कि निजी पूंजी, प्रतिस्पर्धा और व्यावसायिक दक्षता से बिजली व्यवस्था अधिक प्रभावी होगी। लेकिन बिजली कोई सामान्य बाजारू वस्तु नहीं है। कोई उपभोक्ता यह नहीं कह सकता कि मेरे इलाके में बिजली देने वाली कंपनी पसंद नहीं है, इसलिए मैं अपनी नई तारें किसी दूसरी कंपनी से बिछवा लूंगा।इसीलिए निजीकरण के साथ मजबूत नियमन भी आया।
आज ओफजेम, यानी ऑफिस ऑफ गैस एंड इलेक्ट्रिसिटी मार्केट्स, ऊर्जा क्षेत्र का स्वतंत्र नियामक है। नेटवर्क कंपनियां निजी हो सकती हैं, लेकिन उनकी आय और निवेश पर नियामकीय नियंत्रण है। उनसे यह भी अपेक्षा की जाती है कि वे नेटवर्क की विश्वसनीयता और सेवा के निर्धारित स्तर को बनाए रखें। अर्थात निजी कंपनी है, लेकिन मनमानी की छूट नहीं है।कंपनी कमाती भी है और जोखिम भी उठाती है
यहां एक सामान्य भ्रम दूर करना जरूरी है। बिजली कंपनी निजी है तो इसका अर्थ यह नहीं कि उपभोक्ता के बिल का पूरा पैसा कंपनी का मुनाफा है।
बिजली के बिल में बिजली खरीदने की लागत, नेटवर्क का खर्च, सरकारी नीतियों से जुड़े शुल्क, कर और सप्लायर का मार्जिन, कई चीजें शामिल होती हैं।
ऊर्जा संकट के दौरान ब्रिटेन की कई खुदरा ऊर्जा कंपनियां भारी वित्तीय दबाव में आईं और कुछ कंपनियां बाजार से बाहर भी हो गईं। यानी निजी क्षेत्र में होना मुनाफे की गारंटी नहीं है।
दूसरी ओर नेटवर्क कंपनियों के लिए नियामक यह तय करता है कि निवेश और संचालन के बदले उन्हें कितनी आय मिल सकती है।
यह व्यवस्था कुछ हद तक ऐसी है कि कंपनी को कमाने का अवसर भी मिले और उपभोक्ता को लूटने की गुंजाइश भी न रहे।
और अब सबसे रोचक बात, यहां लोग बिल कैसे देते हैं?भारत में बिजली वितरण के क्षेत्र में काम करने वाला व्यक्ति बिलिंग और कलेक्शन की समस्या को भलीभांति समझता है।
बिल बना देना आसान है, पैसा खाते में आ जाना असली उपलब्धि है।
बिजली चोरी, गलत मीटर, लंबे समय से बकाया बिल, सरकारी विभागों की देनदारियां, सब्सिडी और भुगतान क्षमता जैसी समस्याओं के कारण भारत में राजस्व वसूली हमेशा बड़ी चुनौती रही है।
लंदन में सामान्य घरेलू जीवन का दृश्य कुछ अलग है।बहुत से लोग बिजली का बिल हाथ में लेकर हर महीने भुगतान करने नहीं बैठते। बैंक खाते से डायरेक्ट डेबिट की सुविधा होती है। तय तारीख पर पैसा स्वतः निकल जाता है।
अर्थात यहां बिल देने की प्रक्रिया काफी हद तक याददाश्त से हटकर व्यवस्था पर निर्भर बन चुकी है।
मुझे यह बात विशेष रूप से रोचक लगी।
भारत में हम अक्सर सोचते रहे हैं कि उपभोक्ता से बिल कैसे वसूला जाए। यहां व्यवस्था ने काफी हद तक सवाल उलट दिया है, भुगतान ऐसा कैसे हो कि उपभोक्ता को बिल देने की प्रक्रिया ही बोझ न लगे।
लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं कि ब्रिटेन में कोई बिल भुगतान नहीं रोकता। यहां भी ऊर्जा ऋण बड़ी समस्या बन चुका है। जून 2025 तक घरेलू ऊर्जा उपभोक्ताओं का कुल बकाया लगभग 4.43 अरब पाउंड था।
फर्क इतना है कि नियमित भुगतान के लिए डिजिटल बैंकिंग, डायरेक्ट डेबिट, स्मार्ट मीटर और प्रीपेमेंट जैसी व्यवस्थाओं का इस्तेमाल अधिक होता है।
भारत भी स्मार्ट मीटर और डिजिटल भुगतान के माध्यम से इसी दिशा में तेजी से बढ़ रहा है।
कर्मचारी, आखिर कंपनी का असली चेहरा
निजीकरण के बाद बिजली कंपनियों के कर्मचारियों की स्थिति भी बदली। वे सरकारी बिजली बोर्ड के कर्मचारी नहीं रहे, बल्कि निजी कंपनियों के कर्मचारी बन गए। कामकाज में दक्षता, उत्पादकता और लागत का महत्व बढ़ा।
लेकिन एक बात नहीं बदली, बिजली व्यवस्था अंततः इंसानों से ही चलती है।
फील्ड इंजीनियर, लाइन कर्मचारी, नियंत्रण कक्ष के कर्मचारी और रखरखाव दल आज भी इस पूरे नेटवर्क की रीढ़ हैं।
और यहां मुझे अपनी पुरानी बात फिर याद आती है, लाइन कर्मचारी कंपनी के ब्रांड एम्बेसडर हैं।
उपभोक्ता के घर बिजली जाने पर उसे कंपनी की बैलेंस शीट नहीं दिखाई देती। उसे वह कर्मचारी दिखाई देता है जो समस्या ठीक करने उसके घर आया है।
वह समय पर आया, उसने ठीक से बात की, काम सुरक्षित ढंग से किया और बिजली चालू कर दी, तो उपभोक्ता के मन में पूरी कंपनी के प्रति विश्वास पैदा होता है। व्यवस्था इतनी सुदृढ़ है कि फाल्ट न्यूनतम हैं।
पेंशन का क्या हुआ?
निजीकरण के समय पुराने कर्मचारियों की पेंशन व्यवस्था को अचानक समाप्त नहीं किया गया। बिजली आपूर्ति क्षेत्र की पुरानी पेंशन योजनाएं जारी रहीं और समय के साथ उनके प्रशासन की अलग व्यवस्थाएं बनीं।
आज भी यूके पावर नेटवर्क्स के अंतर्गत पुराने कर्मचारियों से जुड़ी पेंशन योजनाएं हैं और नए कर्मचारियों के लिए अलग पेंशन व्यवस्था है।
अर्थात निजीकरण केवल मालिक बदलने की कहानी नहीं थी। कर्मचारियों की सेवा शर्तें, पेंशन, निवेश, नियमन और उपभोक्ता हित, इन सभी को नई व्यवस्था में जगह देनी पड़ी।
भारत और ब्रिटेन, बिजली की दो कहानियां
तकनीकी दृष्टि से दोनों देशों के अभियंता लगभग एक ही भाषा बोलते हैं। वोल्टेज, करंट, फ्रीक्वेंसी, ट्रांसफॉर्मर, प्रोटेक्शन और सिस्टम बैलेंस के नियम लंदन में भी वही हैं जो भारत में हैं।
फर्क व्यवस्था की अर्थव्यवस्था और प्रशासन में है।
भारत में बिजली वितरण का आकार बहुत बड़ा है। करोड़ों उपभोक्ता, विशाल क्षेत्र, कृषि और घरेलू उपभोक्ताओं की अलग जरूरतें, सब्सिडी, चोरी और लाइन लॉसेज जैसी चुनौतियां हैं।
ब्रिटेन की चुनौतियां अलग हैं। यहां इलेक्ट्रिक कारें बढ़ रही हैं, घरों में हीट पंप और सौर पैनल बढ़ रहे हैं और पवन ऊर्जा की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है। इसलिए पुराने नेटवर्क को नए विद्युत युग के लिए तैयार करना बड़ी चुनौती है।
आने वाले समय में बिजली का मतलब केवल बिजलीघर और तार नहीं रहेगा। स्मार्ट मीटर, बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, स्थानीय सौर उत्पादन और डिजिटल नियंत्रण, सब मिलकर एक नई विद्युत व्यवस्था बनाएंगे।
आखिर में, एक अभियंता की बात
लंदन की सड़कों पर चलते हुए अंडरग्राउंड बिजली के तार दिखाई नहीं देते। छोटे छोटे सबस्टेशन भी अक्सर हमारी नजर से सीधे तौर पर छिपे रहते हैं। भारत में अब तक ऐसा नहीं हो पाया है।
लेकिन इसी अदृश्य नेटवर्क से रोशनी, भूमिगत रेल, अस्पताल, दुकान, बैंक और इस शहर का डिजिटल जीवन निरंतर चलता है।
लगभग चार दशक विद्युत मंडल में बिताने के बाद दूसरे देश की बिजली व्यवस्था को देखना मेरे लिए केवल तकनीकी जिज्ञासा नहीं है। यह अपने पुराने कार्यजीवन को नए संदर्भ में देखने जैसा भी है।
कंपनियां बदल सकती हैं, स्वामित्व बदल सकता है, नियम बदल सकते हैं, तकनीक बदल सकती है, लेकिन बिजली व्यवस्था की मूल कसौटी वही रहती है, विश्वसनीय बिजली और संतुष्ट उपभोक्ता।
और इस पूरी कहानी में मुझे सबसे महत्वपूर्ण चीज फिर वही लगती है, जिसे मैं अपने कर्मचारियों से कहा करता था,
लाइन कर्मचारी कंपनी का ब्रांड एम्बेसडर है।
क्योंकि अंततः बिजली के तारों से ज्यादा महत्वपूर्ण है वह भरोसा, जो उन तारों के सहारे उपभोक्ता के घर तक पहुंचता है।
शायद आधुनिक विद्युत व्यवस्था की सफलता का सबसे सरल अर्थ भी यही है, बिजली जाए तो जल्दी लौट आए, बिल आए तो आसानी से चुक जाए और उपभोक्ता को लगे कि उसके साथ व्यवस्था पूरी जिम्मेदारी से खड़ी है।
रास्ते दोनों देशों के एक से ही हैं, ब्रिटेन बिना विरोध थोड़ा आगे जरूर चल रहा है।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव
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