काव्य :
!! देव घनाक्षरी छंद!!
बंद कारागार मध्य ,चिंतित थे वसुदेव,
प्रगटे कन्हैया घन, गरजें घनन-घनन।
गोकुल को लेके चले,डलिया लिटाये लाल,
छुऍं पद यमुना की, लहरें कनन-कनन।
निशा अँधियारी घोर,तड़के तड़ित व्योम,
पवन प्रचण्ड वेग, चलत सनन-सनन।
यमुना को पारकर, पहुँचेे यशोदा द्वार,
नाचें नरनारी बाजें,झाँझरी झनन-झनन।।
-रामकिशोर श्रीवास्तव 'रवि',भोपाल (म.प्र.)
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