काव्य :
तेरे वगैर !!
दिया हाथ तुमने, कब मेरे हाथो में
मुझे कुछ पता नही
अब दो कदम भी नही चल सकता
तेरे वगैर ।।
नीम के नीचे,काटी थी हम दोनो ने
कई दोपहर
मगर,अब छाँव नही ठूढ पाऊंगा
तेरे वगैर ।।
रचा था गीत, हम दोनो ने
अपनी तूलिकाओ को बदलकर
मगर, अब शब्द नही जोड़ पाऊँगा
तेरे वगैर ।।
जमीं को सींचकर ,वनाया था
एक खूबसूरत बागवां
मगर,अब फूल नही चुन पाऊँगा,
तेरे वगैर ।।
बनाई थी तस्वीर मेने,
तुम्हारी यादो के संग,
मगर,रंग नही भर पाऊंगा
तेरे बगैर ।।
एक किताव लिख रहा था मे,
तुम्हारे सामने वैठकर
मगर, नही लिख पाऊंगा, आगे
तेरे वगैर ।।
- देवेन्द्र थापक,
गुलमोहर भोपाल
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