काव्य :
सच्चा प्रेम
प्रेम कीजिए तुम ईश्वर से,
जो सच्चा सुखदाई है।
जिसने जन्म दिया मानव का,
अद्भुत सृष्टि बनाई है।।
करिए अमित प्रेम जीवन में,
मात-पिता से हे!भाई।
जन्म जिन्होंने दिया हमें यह,
देह उन्हीं से है पाई।।
करिए अतुलित प्रेम जगत में,
अपने गुरु से हे! बंदे।
ज्ञान मिले हिय तिमिर मिटे सब,
कट जायें जग के फंदे।।
जिनकी कृपा छाँव के नीचे,
ज्ञान सकल हमने पाया।
जीवनपथ पर सीख उन्होंने,
देकर चलना सिखलाया।।
प्रेम अगर अपने जीवन में,
दीनदुखी से कर पाएँ।
कष्ट मिटाकर सब हम उनके,
भव सागर से तर जाएँ।।
दंभ हमारे इस जीवन में,
ईश्वर! कभी न आ पाए।
सदा रहे मानवता मन में,
जीवन सुखमय हो जाए।।
करें हमेशा प्रेम जगत में,
वृद्ध पिता अरु माता से।
पाएँ नहीं कष्ट वे कोई,
विनती करें विधाता से।।
वे ही सच्चे परमेश्वर हैं,
उनकी सेवा कर पाएँ।
पाकर कष्ट कहीं वे हमसे,
चले न वृद्धाश्रम जाएँ।।
अतिशय प्यार करें जीवन में,
अपनी भारत माता से।
करें देश पर प्राण निछावर,
विनती करें विधाता से।।
राष्ट्र-प्रेम पालें जीवन में,
करें न इससे गद्दारी।
अरि का खोज मिटा डालें हम,
रखें देश हित तैयारी।।
- छोटेलाल सारस्वत,अजमेर (राज.)
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